बीबीसी पर विवाद: ब्रिटिश सरकार पर नियुक्ति प्रभावित करने का लगा आरोप
कंजरवेटिव पार्टी से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि ब्रेमर की नियुक्ति ने बीबीसी में मौजूद वामपंथी पूर्वाग्रहों को स्पष्ट कर दिया है। जबकि जॉनसन की कंजरवेटिव पार्टी के विरोधियों का इल्जाम है कि जॉनसन सरकार बीबीसी की नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है...
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एक नई नियुक्ति से बीबीसी फिर विवाद में आया है। इसी सिलसिले में ये आरोप भी लगा है कि ब्रिटिश सरकार लगातार बीबीसी पर अपना शिकंजा कसती जा रही है। विवाद की शुरुआत पिछले हफ्ते ये खबर आने के साथ हुई कि जेस ब्रेमर को बीबीसी का एक्जीक्यूटिव न्यूज एडिटर नियुक्त किया गया है। ब्रेमर इसके पहले वेबसाइट हफपोस्ट की ब्रिटिश शाखा की प्रधान संपादक रह चुकी हैं। रविवार को अखबार मेल ऑन सनडे (अखबार डेली मेल के रविवारीय संस्करण) ने ब्रेमर के रिकॉर्ड का एक लेखा-जोखा प्रकाशित किया।
इसमें कहा गया कि ब्रेमर वामपंथी रुझान वाली हैं। अतीत में वे ब्रेग्जिट और प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की खुली आलोचना करती रही हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया कि बीबीसी बोर्ड के सदस्य रॉबी गिब ने ब्रेमर की नियुक्ति को लेकर चेतावनी दी थी। उन्होंने बोर्ड की बैठक में दो टूक कहा था कि अगर ब्रेमर की नियुक्ति हुई, तो जॉनसन सरकार का बीबीसी में भरोसा खत्म हो जाएगा, जो पहले ही काफी कमजोर हो चुका है।
ये रिपोर्ट छपने के बाद दोनों पक्षों से बयानबाजी तेज हो गई। कंजरवेटिव पार्टी से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि ब्रेमर की नियुक्ति ने बीबीसी में मौजूद वामपंथी पूर्वाग्रहों को स्पष्ट कर दिया है। जबकि जॉनसन की कंजरवेटिव पार्टी के विरोधियों का इल्जाम है कि जॉनसन सरकार बीबीसी की नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। इसके लिए उसके प्रतिनिधि ने बीबीसी को यह कर धमकाया कि इस नियुक्ति से बीबीसी में सरकार का भरोसा टूट जाएगा।
इस मुद्दे पर जारी विवाद के बीच बीबीसी के करंट अफेयर्स प्रोग्राम- न्यूजनाइट के नीति संपादक लुइस गुडॉल ने ट्विटर संदेशों के जरिए ब्रेमर का बचाव किया। ब्रेमर इसके पहले न्यूजनाइट के डिप्टी एडिटर के रूप में काम कर चुकी हैं। गुडॉल ने अपने संदेशों में ब्रेमर की आलोचना को उद्विग्न करने वाला बताया और कहा कि मेल ऑन संडे की रिपोर्ट में स्त्री-द्रोही भावना की झलक मिली है। लेकिन ये ट्विट जल्द ही डिलीट कर दिए गए। बाद में गुडॉल ने बताया कि बीबीसी ने उनसे वे ट्विट हटाने को कहा था। पर्यवेक्षकों के मुताबिक बीबीसी प्रबंधन ने ब्रेमर से संबंधित मसले को इस संस्था का आंतरिक मामला माना है। इसलिए अपने एक अधिकारी के ट्विट को उन्होंने हटवाने का फैसला किया।
इसके बाद डेली मेल ने एक रिपोर्ट में कहा कि गुडॉल को बीबीसी ने ‘चुप’ करवा दिया है। उधर, इस मुद्दे पर मीडिया विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कोलंबिया जर्नलिज्म स्कूल में प्रोफेसर एमिली बेल ने कहा है- इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कैसे बीबीसी बोर्ड में अपने दोस्तों की नियुक्ति करके बीबीसी की नियुक्ति प्रक्रिया को निर्देशित करते हैं।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि हाल में कई विवादों में फंसने के कारण बीबीसी की छवि प्रभावित हुई है। बीते जून में न्यूजनाइट प्रोग्राम की प्रजेंटर एमिली मैटलिस पर निष्पक्षता संबंधी नियमों के उल्लंघन के आरोप लगे थे। उन्होंने तब अपने ट्विट्स में कोरोना महामारी से निपटने में सरकार की भूमिका की आलोचना की थी। तब कंजरवेटिव पार्टी के समर्थकों ने मैटलिस पर वामपंथी पूर्वाग्रह रखने का आरोप लगाया था। अब बीबीसी प्रबंधन पर ऐसे ही आरोप लगाए गए हैं।