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क्या अमेरिका में गैर-बराबरी की समस्या हल कर पाएंगे जो बाइडन?
Thu, 21 Jan 2021 04:36 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 21 Jan 2021 04:36 PM IST
सार
पीउ रिसर्च के एक अध्ययन के मुताबिक जी-7 देशों के बीच आज सबसे ज्यादा आर्थिक गैर-बराबरी अमेरिका में ही है। इसका असर कई रूपों में देखने को मिला है। नशाखोरी और आत्महत्या की दरों में तेज वृद्धि हुई है...
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आदेशों पर हस्ताक्षर करते जो बाइडन
- फोटो : Twitter @DDNewsHindi
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विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने कार्यकाल के पहले दिन जो कदम उठाए, उनमें मौजूदा सरकारी नीतियों में न्याय की स्थिति की समीक्षा कराना भी है। राष्ट्रपति ने संघीय एजेंसियों को आदेश दिया कि 200 दिन के अंदर वे ये उपाय सुझाएं कि गैर-बराबरी संबंधी नीतिगत पहलुओं को कैसे दूर किया जाए। इस कदम के जरिए जो बाइडन ने ये संकेत दिया कि वे देश में मौजूद दीर्घकालिक और कहीं अधिक गहरी समस्याओं से वाकिफ हैं और उनका सामना करने को तैयार हैं।
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समाजशास्त्री और देश के प्रोग्रेसिव खेमे लंबे समय से इस ओर ध्यान खींचते रहे हैं कि अमेरिका की बुनियादी समस्या गैर बराबरी, सामाजिक अलगाव और राजनीतिक विभाजन है। कोरोना महामारी ने इस समस्याओं को और गहरा बना दिया है। बाइडन के सत्ता संभालने के मौके पर वेबसाइट एक्सियोस.कॉम ने इन समस्याओं पर हुए अध्ययनों को आधार बनाते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की। वेबसाइट ने कहा कि अमेरिका का भविष्य इस पर ही निर्भर करता है कि इन समस्याओं को कितने प्रभावी ढंग से हल किया जाता है।
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इन अध्ययनों के मुताबिक अमेरिका में सामाजिक प्रगति का ट्रेंड 1980 के बाद से पलट गया। उस दशक से पहले लोग औसतन 30 साल की उम्र में जितनी रकम कमाते थे, 1980 के बाद पैदा हुए बच्चों के लिए उतना कमा पाना कठिन हो गया। वास्तविक वेतन की वृद्धि रुक जाने, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सेवाओं की लागत में भारी इजाफा, और धनी लोगों के हाथ में अधिक से अधिक धन इकट्ठा होते जाने के कारण औसत जीवन स्तर में गिरावट आई।
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यह सामाजिक ट्रेंड देखने को मिला कि कॉलेज शिक्षित लोगों की आमदनी तो तेजी से बढ़ी, लेकिन जो लोग ऊंची शिक्षा पाने में नाकाम रहे, वे पीछे छूटते गए। ऑटोमेशन (स्वचालित मशीनों से काम) और ग्लोबलाइजेशन के कारण हालत और गंभीर हो गई है।
पीउ रिसर्च के एक अध्ययन के मुताबिक जी-7 देशों के बीच आज सबसे ज्यादा आर्थिक गैर-बराबरी अमेरिका में ही है। इसका असर कई रूपों में देखने को मिला है। नशाखोरी और आत्महत्या की दरों में तेज वृद्धि हुई है। 2019 में 81 हजार से ज्यादा लोग नशाखोरी के कारण मर गए। आत्महत्या की दर में 1999 के बाद 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अपना मकान खरीदने की स्थिति में ना होने के कारण आज ज्यादातर युवा अमेरिकी अपने माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हो गए हैं। 1930 के दशक की महामंदी के बाद आज ये संख्या अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है।
अमेरिका में कोरोना महामारी से चार लाख से ज्यादा लोगों की हुई मौत के पीछे ऐसी ही सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को मूल कारण माना गया है। महामारी के कारण अर्थव्यवस्था के ठप हो जाने से बेरोजगारी बढ़ी है। इसकी ज्यादा मार उन लोगों पर पड़ी है, जिनका काम वर्क फ्रॉम होम के जरिए नहीं हो सकता।
इन सबके बीच नस्लीय और राजनीतिक टकराव बढ़ा है। पिछले साल देश में ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन ने चौड़ी हुई नस्लीय खाई की तरफ ध्यान खींचा था। हाल में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के धुर दक्षिणपंथी समर्थकों ने जैसा हिंसक रूप दिखाया, उससे देश में गहराते गए राजनीतिक ध्रुवीकरण का अंदाजा लगा। विश्लेषकों का कहना है कि जो बाइडन के सामने इन्हीं सभी समस्याओं से निपटने की गंभीर चुनौती मौजूद है।
बाइडन ने राष्ट्रपति पद का शपथ लेने के बाद राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में कहा- ‘हमारे राष्ट्र के इतिहास में बहुत कम लोगों के सामने ऐसी कठिन चुनौतियां रही हैं या बहुत कम ऐसे लोग हुए हैं जिन्हें अपना समय आज के जितना चुनौती भरा लगा हो।’ विश्लेषकों ने कहा है कि बाइडन की ये टिप्पणी बताती है कि उन्होंने बीमारी का सही निदान किया है। लेकिन वे इसका सही इलाज कर पाएंगे या नहीं, इस सवाल का जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है।