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अरबी लेखिका को पहली बार मिला बुकर पुरस्कार, उपन्यास के लिए मिला सम्मान
Thu, 23 May 2019 05:21 AM IST
गौरव द्विवेदी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: गौरव द्विवेदी
Updated Thu, 23 May 2019 05:21 AM IST
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ओमान की लेखिका जोखा अल्हार्थी (बाएं) और अनुवादक मर्लिन बूथ (दाएं)
- फोटो : सोशल मीडिया
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पश्चिम एशियाई देश ओमान की साहित्यकार जोखा अल्हार्थी ने इस साल का प्रतिष्ठित मैन बुकर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। अल्हार्थी ने यह पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया है, क्योंकि वह पहली महिला उपन्यासकार हैं, जिन्हें अरबी भाषा में लिखे गए उनके उपन्यास ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ के लिए यह मशहूर पुरस्कार मिला है। 40 वर्षीय अल्हार्थी ने लंदन में समारोह के बाद कहा, मैं रोमांचित हूं कि अरबी संस्कृति के लिए एक खिड़की खोली गई है।
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जोखा अल्हार्थी की यह जीत इस मायने में भी खास है क्योंकि उनकी रचना मूल रूप से अरबी में है और इसके अंग्रेजी में अनुवाद को बुकर पुरस्कार की चयन समिति ने चुना है। जोखा अल्हार्थी को बुकर पुरस्कार में जीत के बतौर 50 हजार पाउंड यानी 44 लाख रुपए से ज्यादा की रकम मिलेगी, जिसे उन्होंने अपने उपन्यास ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ की अनुवादक अमेरिका की मर्लिन बूथ के साथ साझा करने का फैसला किया है। ओमान की तीन बहनों पर केंद्रित मूलत: अरबी में लिखे गए इस उपन्यास का मर्लिन ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। इस उपन्यास में तीन बहनों- मय्या, अस्मा और ख्वाला की कहानी है। ये तीनों बहनें एक मरुस्थली देश में रहती हैं। उपन्यास में तीनों बहनों द्वारा दासता के अपने इतिहास से उबरने के बाद जटिल आधुनिक विश्व के साथ तालमेल बनाने के संघर्ष का वर्णन किया गया है।
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लैंगिक भेदभाव के तमाम साहित्य से इतर
बुकर पुरस्कार चयन समिति के एक जज इतिहासकार बेट्टानी हफ्स ने कहा कि अंग्रेजी साहित्य में इस तरह की रचनाधर्मिता हमें शायद ही देखने को मिलती है, जैसी अल्हार्थी के ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ में पढ़ने को मिलती है। यह उपन्यास दासता, लैंगिक भेदभाव और रूढ़ियों को लेकर लिखे गए तमाम साहित्य से इतर है। बुकर पुरस्कार के जजों की समिति इस पुस्तक की इन्हीं खूबियों को दुनिया के सामने लाना चाहती है।
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कई दिग्गजों से था अल्हार्थी का मुकाबला
जोखा अल्हार्थी के उपन्यास ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ का बुकर पुरस्कार के लिए चयन अपने आप में अनोखा है। उनका मुकाबला ओल्गा टोकरजुक, एनी एर्नाक्स और युआन गैब्रियल वैस्केज जैसे धुरंधर साहित्यकारों से था। अनुवाद की श्रेणी में काल्पनिक कथा लेखिकाओं के बीच अल्हार्थी का चयन मुश्किल तो था, लेकिन पुरस्कार चयन समिति ने काफी सोच-विचार के बाद उनके नाम पर मुहर लगा दी।