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थाईलैंड में बेकाबू होते जा रहे हैं राजतंत्र विरोधी प्रदर्शन, एक लाख लोग उतरे बैंकॉक की सड़कों पर
Tue, 27 Oct 2020 06:57 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बैंकॉक
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बैंकॉक
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Tue, 27 Oct 2020 06:57 PM IST
सार
संकट का हल निकालने के लिए सोमवार और मंगलवार को देश की संसद का दो दिन का विशेष अधिवेशन हुआ। लेकिन संकेत हैं कि सरकार का ये दांव उलटा पड़ गया। संसद के भीतर भी विपक्ष ने आंदोलनकारियों की मांगें उठा दीं...
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Protest in Thailand
- फोटो : Agency
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विस्तार
थाईलैंड में संसद का विशेष सत्र बुलाकर राजतंत्र विरोधी आंदोलन के कारण पैदा हुए अभूतपूर्व संकट का हल निकालने की जो कोशिश की गई, उसके नाकाम हो जाने के संकेत हैं। इसके पहले वहां इसी महीने लागू की गई इमरजेंसी भी जनप्रदर्शनों को दबा पाने में विफल रही थी। इमरजेंसी लागू करने के साथ ही आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद देश के अलग- अलग हिस्सों में विशाल प्रदर्शन जारी रहे हैं।
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संकट का हल निकालने के लिए सोमवार और मंगलवार को देश की संसद का दो दिन का विशेष अधिवेशन हुआ। लेकिन संकेत हैं कि सरकार का ये दांव उलटा पड़ गया। संसद के भीतर भी विपक्ष ने आंदोलनकारियों की मांगें उठा दीं। विपक्ष के नेता सोमपोंग अमोर्नविवात ने कहा कि अगर सरकार सचमुच समस्या हल करना चाहती है और कानून का पालन के लिए वचनबद्ध है, तो उसे अवश्य इस्तीफा दे देना चाहिए। सोमवार को सत्र के पहले दिन एक लाख से ज्यादा प्रदर्शनकारियों ने राजधानी बैंकाक की सड़कों पर मार्च किया।
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आंदोलनकारियों की तीन प्रमुख मांगें हैं। वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री प्रयुथ चार-ओचा इस्तीफा दें, देश का संविधान फिर से लिखा जाए और राजतंत्र के ढांचे में सुधार हो- यानी उसकी शक्तियां घटाई जाएं। हालांकि आंदोलन की शुरुआत प्रधानमंत्री को हटाने की मांग को लेकर हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे इसमें राजतंत्र विरोधी स्वर उभर गए, जबकि अब तक थाईलैंड में राजा को आलोचना से परे माना जाता था।
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सोमवार को राजतंत्र विरोधी आंदोलन का नया रूप देखने को मिला, जब लाखों प्रदर्शनकारी बैंकाक में जर्मन दूतावास पहुंच गए। उन्होंने जर्मनी से थाई राजा की गतिविधियों की जांच कराने की मांग की। गौरतलब है कि वर्तमान राजा अपना ज्यादातर समय जर्मनी में गुजारते हैं। इन प्रदर्शनों का असर हुआ है।
जर्मन सरकार ने एक औपचारिक बयान में कहा है कि ये बात अस्वीकार्य है कि राजा महा वजिरालोंगकोर्ण किसी यूरोपीय देश में रहकर वहां से अपने देश पर राज करें। जर्मन विदेश मंत्री हेइको मास ने कहा है कि थाई राजा के जर्मनी निवास की पूरी अवधि पर नजर रखी गई है। अगर उनके आचरण में कोई गलती पाई जाएगी, तो उस पर कार्रवाई होगी।
आंदोलन की शुरुआत छात्रों ने की थी। प्रधानमंत्री प्रयुथ पहले सैनिक जनरल थे, जिन्होंने निर्वाचित सरकार का तख्ता पलटकर सत्ता हासिल की थी। उसके बाद उन्होंने चुनाव कराए, जिसमें जीत कर वे पिछले छह साल से शासन कर रहे हैं। पिछले साल उन्होंने दोबारा चुनाव जीता था। लेकिन चुनाव की प्रक्रिया संदिग्ध रही है। चूंकि राजा का समर्थन प्रयुथ के साथ है, इसलिए धीरे-धीरे वे भी निशाने पर आ गए हैं। थाईलैंड के मौजूदा संविधान के मुताबिक राजा का आदर करना अनिवार्य है। इसीलिए प्रदर्शनकारी सैनिक सत्ताधारियों द्वारा तैयार इस संविधान को बदलने की मांग कर रहे हैं।
इस मुद्दे पर देश में गहरा मत विभाजन हो गया है। शासक वर्ग के लोग, पूर्व सैनिक अधिकारी और धनी-मानी तबके राजा की हैसियत में किसी बदलाव के खिलाफ हैं। ऐसे कई प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें राजा को निशाना बनाए जाने का विरोध किया गया है। लेकिन इन प्रदर्शनों का आकार राजतंत्र विरोधी प्रदर्शनों से काफी छोटा रहा है।