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आस्था में बदलाव: अमेरिका में लगातार घट रहा है धर्म का असर, पूजा स्थलों पर कम जा रहे हैं युवा

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 08 Apr 2021 04:26 PM IST

सार

सर्वे में सामने आया, आज अमेरिका में जिसकी उम्र जितनी अधिक है, उनके पूजा स्थल जाने की संभावना उतनी ज्यादा है। जबकि 30 साल से कम उम्र के अमेरिकियों में पूजा स्थल जाने या अपने को धार्मिक बताने वालों की संख्या बहुत कम हो गई है...
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चर्च - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

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विस्तार

अमेरिका में हाल में धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा का असर बढ़ने के बावजूद असल में धर्म-कर्म में लोगों की दिलचस्पी घटी है। आज देश की आबादी में 50 फीसदी से भी कम ऐसे लोग हैं, जो नियमित रूप से किसी चर्च, सिनेगॉग (यहूदी पूजा स्थल) या मस्जिद में उपासना के लिए जाते हैं। ये बात एक ताजा सर्वे से जाहिर हुई है। जानकारों का कहना है कि इस सर्वे के नतीजे अमेरिका के राष्ट्रीय स्वरूप में आए भारी बदलाव की तरफ इशारा करते हैं। उनके मुताबिक इसका राजनीति और सामाजिक सद्भाव के लिए दूरगामी असर होगा।
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गैलप पोल (जनमत सर्वेक्षण) के जारी ताजा नतीजों के मुताबिक सिर्फ 47 फीसदी अमेरिकियों ने कहा कि वे किसी पूजा स्थल पर उपासना के लिए जाते हैं। 2018 में ये संख्या 50 फीसदी थी। 1999 में ये संख्या 70 फीसदी थी। गैलप ने जब 1937 में इस तरह के सर्वे की शुरुआत की थी, तब 73 फीसदी लोग नियमित रूप से किसी पूजा स्थल पर जाते थे। साल 2000 तक ये संख्या 70 फीसदी या उससे ऊपर बनी रही। इसलिए जानकारों का कहना है कि अधिक से अधिक लोगों का पूजा स्थल ना जाना एक नई और 21वीं सदी की परिघटना है।


इसके साथ ही अमेरिका में ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो साफ कहते हैं कि उनकी किसी धर्म में आस्था नहीं है। 1998 में अमेरिका में ऐसे सिर्फ आठ फीसदी लोग थे। लगातार पिछले तीन साल गैलप के सर्वे में ऐसा कहने वाले लोगों की संख्या 21 फीसदी रही है। सर्वे नतीजों पर गौर करने वाले विश्लेषकों का कहना है कि 21वीं सदी की पीढ़ी अधिक धर्म निरपेक्ष नजरिया अपना रही है।

सर्वे में सामने आया कि आज अमेरिका में जिसकी उम्र जितनी अधिक है, उनके पूजा स्थल जाने की संभावना उतनी ज्यादा है। जबकि 30 साल से कम उम्र के अमेरिकियों में पूजा स्थल जाने या अपने को धार्मिक बताने वालों की संख्या बहुत कम हो गई है। जानकारों के मुताबिक ये ट्रेंड भविष्य में और मजबूत होगा, क्योंकि जिनके माता-पिता पूजा स्थल नहीं जाते, तो उनके बच्चों के धर्म-कर्म में रुचि लेने की संभावना और कम होगी।

वैसे जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि उम्रदराज अमेरिकियों में भी किसी धर्म में आस्था ना रखने वालों की संख्या बढ़ी है। ये संख्या 1999 में 11 फीसदी थी, जो अब 20 फीसदी हो गई है। इस ट्रेंड का असर बदले सामाजिक नजरिए के रूप में सामने आ रहा है। 2017 के गैलप पोल से सामने आया था कि गर्भ निरोधकों के इस्तेमाल, विवाह के बाहर यौन संबंध, समलैंगिक संबंध आदि को सही मानने वाले अमेरिकी लोगों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। राजनीति शास्त्री रॉनल्ड एफ इंगलहार्ट ने पिछले साल कहा था कि बदले नजरिए के कारण अमेरिका में गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल बढ़ा है और इसका असर जन्म दर गिरने के रूप में सामने आया है।

इस बदलाव का असर राजनीति में भी दिख रहा है। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि 1960 के दशक में ब्लैक समुदाय के अधिकारों के लिए हुए सिविल राइट मूवमेंट के केंद्र ब्लैक चर्च थे। लेकिन हाल में हुए ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन में शामिल होने वाले युवा धार्मिक प्रवृत्ति के नहीं हैं, भले वे कभी- कभी धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल कर लेते हों। साथ ही देखा गया है कि जब कोई व्यक्ति अपनी पहचान ईसाई से बदल कर किसी धर्म में आस्था ना रखने वाला बना लेता है, तो अकसर वह डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थक बन जाता है।

लेकिन विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि अभी भी मोटे तौर पर अमेरिका एक धार्मिक देश है, भले नियमित रूप से पूजा स्थल ना जाने वाले लोगों की संख्या घट रही हो। अभी भी लगभग 70 फीसदी से अधिक अमेरिकी अपनी धार्मिक पहचान बताते हैं।

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