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सतह ठंडी होने के कारण 50 मीटर तक सिकुड़ गया चंद्रमा, नासा ने रिपोर्ट में बताई यह वजह

Tue, 14 May 2019 12:36 PM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क
न्यूज डेस्क Published by: योगेश साहू Updated Tue, 14 May 2019 12:36 PM IST
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american space agency nasa finds that the moon is steadily shrinking in a study
सुपर स्नो मून

अमेरिका के नेशनल एयर स्पेस म्यूजियम ने एक रिपोर्ट में कहा है कि चंद्रमा सिकुड़ता जा रहा है। ऐसा उसकी अंदरूनी सतह ठंडी होने की वजह से हो रहा है। पिछले करोड़ों सालों में पृथ्वी का यह उपग्रह 50 मीटर तक सिकुड़ चुका है। इसकी वजह से अब वहां भूकंप आ रहे हैं। इनमें से कुछ की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 5 तक आंकी गई है। यह रिपोर्ट नेचर जियोसाइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है। 

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अमेरिका के नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम के वैज्ञानिक थॉमस वेटर्स के मुताबिक, चंद्रमा की सतह पर झुर्रियां कुछ उसी तरह से दिखाई पड़ती हैं, जैसे अंगूर के किशमिश बनने के दौरान दिखाई देती हैं। हालांकि, दोनों में केवल इतना अंतर है कि अंगूर की बाहरी सतह लचीली होती है, जबकि सिकुड़ने पर चंद्रमा की सतह फटने लग जाती है।
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चंद्रमा पर बन रहे हैं थर्स्ट फॉल्ट : वेटर्स का कहना है कि सिकुड़न पैदा होने से उपग्रह पर थर्स्ट फॉल्ट बनने लगे हैं। इस प्रक्रिया में चंद्रमा की एक सतह दूसरी पर चढ़ने लग जाती है। इनकी वजह से ही वहां तीव्र गति के भूकंप आ रहे हैं। उनका कहना है कि थर्स्ट फॉल्ट का आकार सीढ़ियों की तरह से होता है। तकरीबन 10 मीटर ऊंचे फॉल्ट कई किमी में फैले हुए हैं।

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अपोलो मिशन में रखे उपकरणों से पता चला 

वेटर्स का कहना है कि अपोलो मिशन 11, 12, 14, 15 और 16 के जरिए चंद्रमा पर सेस्मोमीटर्स रखे गए थे। इनसे मिलने वाले डेटा की गणना करने पर ही वैज्ञानिक चंद्रमा पर हो रहे बदलाव और भूकंप की जानकारी जुटा पा रहे हैं।

अपोलो 11 के जरिए चंद्रमा पर स्थापित किया गया सेस्मोमीटर तीन सप्ताह तक ही काम कर सका, लेकिन बाकी के उपकरणों से पता चला कि 1969 से 77 के बीच उपग्रह पर 28 छोटे भूकंप आए थे। रिक्टर स्केल पर इनकी तीव्रता 2 से 5 तक आंकी गई। जब अध्ययन और ज्यादा गहराई में किया गया तो पता चला कि इनमें से 8 भूकंप फॉल्ट के 30 किमी दायरे में आए थे।

यही नहीं धरती की तरह चंद्रमा पर कोई कोई टैक्टोनिक प्लेट नहीं है। इसके बावजूद यहां टैक्टोनिक गतिविधि होने से वैज्ञानिक भी हैरान हैं। विशेषज्ञों—वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा में ऐसी गतिविधि ऊर्जा खोने की प्रक्रिया में 4.5 अरब साल पहले हुई थी। इस वजह से चंद्रमा की सतह छुहारे या किशमिश की तरह झुर्रीदार हो जाती है और इसी वजह से वहां भूकंप भी आते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ऊर्जा खोने की प्रक्रिया की वजह से ही चंद्रमा पिछले लाखों सालों से करीब 150 फीट (50 मीटर) तक सिकुड़ चुका है। यूनिवर्सिटी ऑफ मेरी लैंड के भूगर्भ वैज्ञानिक निकोलस चेमर ने कहा कि इसकी संभावना काफी ज्यादा है कि लाखों साल पहले हुईं भूगर्भीय गतिविधियां आज भी जारी हों।

बता दें कि सबसे पहले अपोलो मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने 1960 और 1970 के दशक में चंद्रमा पर भूकंपीय गतिविधियों को मापना शुरू किया था। उनका यह विश्लेषण नेचर जिओसाइंस में प्रकाशित भी हुआ था। इसमें चंद्रमा पर आने वाले भूकंपों का अध्ययन था।

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