भारत-चीन के लोग अमेरिका जाकर पैदा कर रहे हैं बच्चे, क्यों?
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ये पश्चिमी देशों की चकाचौंध का असर है या फिर कुछ और, लेकिन भारत समेत अन्य कई एशियाई देशों के लोग अमेरिकी नागरिकता हासिल करने पर तुले हुए हैं। इन्हीं लोगों ने ही जन्म दिया है ‘बर्थ टूरिज्म’ को।
बर्थ टूरिज्म के बहाने ये लोग अपने बच्चों के लिए अमेरिका, कनाडा और अन्य विकसित देशों की नागरिकता हासिल कर लेते हैं और फिर उन्हें एंकर के तौर पर उपयोग कर इन देशों की सरकारी व अन्य विकसित सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए उपयोग करते हैं।
कुछ महीने पहले अमेरिकी पुलिस ने एक होटल में छापा मार कर बर्थ टूरिज्म के कारोबार का खुलासा किया था। दरअसल बर्थ टूरिज्म के तहत दूसरे देशों से दंपति यात्री वीजा पर आते हैं और अपने बच्चे को अमेरिका जैसे विकसित देश की धरती पर जन्म देते हैं।
इससे यहां के कानून के मुताबिक नवजात को नागरिकता मिल जाती है और फिर वे बच्चे को लेकर अपने देश निकल जाते हैं। बच्चे के 21 साल का होने के बाद बच्चा अमेरिका आता है और यहां का नागरिक बनकर अपने मां-बाप को यहीं बुला लेता है।
चीन है सबसे आगे
रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका में हर साल 50 से 60 हजार लोग बर्थ टूरिज्म पर आते हैं। इसकी वजह यहां के बड़े कॉलेजों में अपने बच्चों को दाखिला दिलाना और अन्य सरकारी सुविधाओं का आसानी से लाभ उठाना शामिल है।
अमेरिका की धरती पर बर्थ टूरिज्म के लिए आने वालों में भारत, चीन, कोरिया और अन्य एशियाई देश शामिल हैं। इसमें शीर्ष पर चीनी हैं। यहां कई होटल व दलाल हैं, जो चीनियों को बर्थ टूरिज्म में मदद करते हैं।
बर्थ टूरिज्म दरअसल धनवानों के सहयोग से उपजा नया कारोबार है। दलालों के जरिये अमेरिका में बच्चे को जन्म देने के लिए और यहां की नागरिकता हासिल करने के लिए करीब 23 लाख रुपये का खर्च करना पड़ता है। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक बर्थ टूरिज्म के लिए 2012 में अमेरिका पहुंचने वाले लोगों की औसत कमाई तकरीबन 13 लाख रुपये थी।