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सिरका बताएगा कैंसर है या नहीं

Sun, 16 Dec 2012 09:54 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Sun, 16 Dec 2012 09:54 PM IST
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testing for cervical cancer with vinegar

कुछ समय पहले तक अमेरिका में जितनी भी महिलाओं की मौत कैंसर से होती थी, उनमें से सबसे अधिक मामले सर्वाइकल कैंसर के होते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब अमेरिका में सर्वाइकल कैंसर के जरिए होने वाली मौतों के बारे में लगभग न के बराबर सुना जाता है।

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ऐसा शायद इसलिए क्योंकि वहां लगभग एक दशक से 'पैप स्मियर' टेस्ट का प्रचलन काफी बढ़ गया है। यह टेस्ट एक तरह की मेडिकल जांच है जिसमें महिलाओं के सर्वाइकल की कोशिकाओं पर जमी हुई गंदगी की जांच कर ये पता लगाया जाता है कि उनमें कैंसर पनपने की गुंजाइश तो नहीं है।
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इस जांच के जरिए काफी पहले यह पता लग जाता है कि कहीं किसी महिला को सर्वाइकल कैंसर का अंदेशा तो नहीं है। लेकिन स्मियर टेस्ट की प्रक्रिया काफी महंगी है। इन असामान्य कोशिकाओं की जांच के लिए एक ख़ास तरह के प्रशिक्षण और मेडिकल किट की ज़रूरत होती है जो भारत जैसे विकासशील देश में संभव नहीं है।
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सिरके का कमाल
भारत में अब भी हर साल हजारों महिलाओं की सर्वाइकल कैंसर की वजह से मौत होती है। इसलिए अब डॉक्टर इसका पता लगाने के लिए एक नए तरीक़े का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे 'सिरका-स्वाब' कहते हैं।

मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर सुरेंद्र शास्त्री कहते हैं कि हमारे लिए विदेशों की तरह बार-बार ये जांच करना मुमकिन नहीं है। पैप स्मियर टेस्ट करने के लिए ना सिर्फ़ हमें प्रशिक्षित कर्मचारियों की ज़रूरत है बल्कि अच्छी प्रयोगशाला की भी ज़रूरत पड़ती है जो भारत के कई हिस्सों में उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसके अभाव में हम महिलाओं को मरने के लिए नहीं छोड़ सकते हैं।'

इसके जवाब में जॉन हॉप्किन्स विश्वविद्यालय ने कुछ अन्य संस्थाओं की मदद से एक बेहद ही सरल और सस्ता विकल्प ढूंढ निकाला है। ये एक ऐसी चीज है जो हर रसोईघर में उपलब्ध है। भारत के महाराष्ट्र राज्य के छोटे से गांव डेरवान में कुछ डॉक्टरों ने एक अस्थाई क्लीनिक बनाया है। इस क्लीनिक में किसी भी तरह की आधुनिक सुविधा मौजूद नहीं है, यहां तक कि बिजली भी नहीं है।

लेकिन अगर आप इस क्लीनिक के पास थोड़े समय के लिए खड़े रहते हैं तो धीरे-धीरे यहां बुर्क़ों में ढंकी मुसलमान महिलाएं आती दिखेंगी। ये महिलाएं जरा भी परेशान नहीं हैं। क्लीनिक चलाने वाली डॉक्टर अर्चना सौनके सिरके की मदद से सर्वाइकल की जांच करती हैं।

डॉक्टर सौनके पूरी प्रक्रिया को समझाते हुए कहती हैं कि योनि में सिरका लगाने के बाद हम तकरीबन एक मिनट तक रुकते हैं। अगर एक मिनट के बाद महिला के सर्वाइकल का सामान्य हल्का गुलाबी रंग सफेद या पीला पड़ने लगता है तो हम समझ जाते हैं कि वहां कैंसर कोशिकाएं मौजूद हैं।

सर्वाइकल के रंग में किसी तरह का बदलाव नहीं होने पर महिला को अच्छी ख़बर के साथ वापिस भेज दिया जाता है। लेकिन अगर खबर बुरी है और किसी महिला के सर्वाइकल में असामान्य कोशिकाएं पाई जाती हैं तो उसे वहीं पर तरल नाइट्रोजन की धार से साफ कर दिया जाता है। पीड़ित महिला को दोबारा डॉक्टर के पास आने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

संयुक्त पहल
यही जांच प्रक्रिया मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल और डेरवान के वालावालकर अस्पताल द्वारा अपनाई जा रही है जहां डॉक्टर सुवर्णा पाटिल चिकित्सा अधीक्षक हैं। पाटिल के अनुसार जब ये सिरका जांच गांवों में शुरू की गई तब महिलाएं इसे लेकर ज्य़ादा उत्साहित नहीं थी।

वे कहती हैं कि जब भी हम उनके घरों में जाते थे तो वे दरवाज़ा बंद कर लिया करतीं थी और इसे लेने से इंकार करतीं थी। कई महिलाओं को जांच की पूरी प्रक्रिया के साथ ही असहजता थीं। उन्हें अपने गुप्तांग की जांच करवाने में शर्म आती थी। उन्हें ये भी लगता था कि अगर उन्हें कैंसर हो भी तो वो ठीक नहीं हो सकता है।

भारत में कम्प्यूटर क्रांति अपने चरम पर है और इस मुहिम में भी कंप्यूटर की मदद ली गई। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह पर लोगों को इकट्ठा कर उन्हें इस बारे में जागरुक किया। उन्होंने नुक्कड़ नाटक, पोस्टर, ग्राम पंचायत व स्कूलों की मदद भी ली।

डॉक्टर पाटिल के मुताबिक, तब भी महिलाएं बड़ी तादाद में क्लीनिक नहीं आईं। खासकर मुसलमान महिलाएं, क्योंकि ये उनके संस्कारों में ही नहीं है। जबकि हमने अपने क्लीनिक में महिला स्टाफ को ही रखा था।

वो बताती हैं कि इसके बाद हमने अपने कर्मचारियों को जागरुक किया। उन्हें समझाया कि वे सर्वाइकल कैंसर के अलावा, हाई ब्लड-प्रेशर, दांतों की समस्या, डाइबिटीज और अन्य स्त्री रोगों के बारे में जांच करने को कहें।

डॉक्टर पाटिल ने इस जांच के दौरान इन महिलाओं के पतियों को भी आमंत्रित करना शुरू किया और फिर स्थिति में सुधार हुआ। वे कहती हैं कि बगैर पुरुषों की मदद के इस काम को करना मुश्किल था। साथ ही महिलाओं के भीतर भी इस टेस्ट को करवाने की इच्छा बढ़ी।

उसके बाद जब महिलाओं ने अपने आसपास की महिलाओं को कैंसर को हराते देखा तो उनकी सोच में भी बदलाव आया। पाटिल कहती हैं कि अब इस अभियान को शुरू हुए आठ साल हो गए हैं और इन आठ सालों की मेहनत ने रंग लाना शुरू कर दिया है। अब लोग हमारे पास आकर हमसे इस तरह के अभियान को शुरू करने की मांग करते हैं।


सिरके द्वारा सर्वाइकल जांच की ये प्रक्रिया अब कई अन्य देशों में भी अपनाई जा रही है। हालांकि वहां इससे थोड़ा और महंगा लेकिन बेहतर जांच सुविधा भी उपलब्ध है। ये जांच भारत की उन हज़ारों-करोड़ों महिलाओं की जान बचा सकतीं है जिनकी मौत हर साल सर्वाइकल कैंसर की वजह से होती है। इसके लिए ज़रूरत सिर्फ़ उनका विश्वास जीतने की है।

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