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'दिवालिया' हुई रीडर्स डायजेस्ट

Tue, 19 Feb 2013 10:03 PM IST
पारुल अग्रवाल
पारुल अग्रवाल Updated Tue, 19 Feb 2013 10:03 PM IST
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readers digest going bankruptcy

मौजूदा पीढ़ी भले ही जानकारियों और मनोरंजन के लिए इंटरनेट पर जीती हो लेकिन अंग्रेज़ी पढ़ने लिखने वालों की वो पीढ़ी जो कागज़ पर छपने वाली पत्र-पत्रिकाओं की कायल थी ‘रीडर्स डायजेस्ट’ का नाम शायद ही कभी भूलेगी।

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लेकिन खबरों के मुताबिक ‘रीडर्स डायजेस्ट’ पत्रिका ने अमेरिका की एक अदालत के सामने चार साल में दूसरी बार खुद को दिवालिया घोषित किए जाने की अर्ज़ी दी है।
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डिजिटल क्रांति और मंदी के बीच लगातार घटते मुनाफे के चलते ‘रीडर्स डायजेस्ट’ पर 53।4 करोड़ डॉलर का ऋण है। कंपनी का मानना है दिवालिया घोषित होने के बाद उसके ऋण में 80 फीसदी तक की कमी आ जाएगी।
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भारत में सबसे अधिक बिकने वाली अंग्रेज़ी पत्रिका रही ‘रीडर्स डायजेस्ट’ मूल रूप से न्यूयॉर्क से निकलने वाली 91 साल पुरानी एक घरेलू पत्रिका है। 1960 से लेकर लगभग सन 2000 तक अंग्रेज़ी पढ़ने-लिखने के शौकीन हर उम्र के लोगों के लिए ‘रीडर्स डायजेस्ट’ पढ़ना मानो संभ्रात होने की निशानी थी।

यही वजह है कि कई लोग इस पत्रिका को ज़रूरत से ज्यादा तरजीह मिलने की बात भी कहते हैं।

नए कलेवर का इंतज़ार
कई लोगों ने सीधी-सरल अंग्रेज़ी सीखने की मंशा से इसे पढ़ना शुरु किया तो कई लोग इस पत्रिका के ज़रिए दुनिया भर से जुड़ना चाहते थे। पत्रिका में छपने वाले घरेलू नुस्खों और स्वास्थ्य सामग्री के चलते आमतौर पर लोग इसके हर अंक को सिलसिलेवार रुप से खरीदना पसंद करते थे।

ऐसे ही एक पाठक मुजाहिद क़ादरी कहते हैं, ''रीडर्स डायजेस्ट वो पहली अंग्रेज़ी पत्रिका है जिसे मैंने पढ़ना शुरु किया, लेकिन अब ये कहीं खो सी गई है। इसकी सामग्री भी अब उतनी अलग नहीं रही।''


इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभाव और इंटरनेट क्रांति ने इस पत्रिका के व्यापार को खासा प्रभावित किया है। बीते सालों में रीडर्स डायजेस्ट को मिलने वाले विज्ञापनों में तेज़ी से कमी आई है।

ज्यादातर लोग अब पत्रिका खरीदने के बजाय इसके डिजिटल संस्करण को पढ़ने में रुचि दिखाते हैं जहां सामग्री आमतौर पर मुफ्त उपलब्ध हो।

यही वजह है कि एक समय अपने सटीक चिकित्सकीय नुस्खों और चुटीली भाषा के लिए मशहूर इस पत्रिका को अब नई तकनीक और नए कलेवर में ढलने का इंतज़ार है।

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