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सलाखों के पार, मां की परछाई ही देख पाने का दर्द

Mon, 31 Oct 2016 03:47 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 31 Oct 2016 03:47 PM IST
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immigration rule issue in America
जेनेट हर शनिवार इसी तरह लोहे की सलाखों के आर पार होकर अपनी मां से मिलती हैं - फोटो : bbc
जेनेट की डायरी में शनिवार की हर सुबह की रूटीन तय होती है. अपने बच्चों के साथ वो अपनी मां से मिलने जाती हैं। आपको ये एक आम सी कहानी लग सकती है लेकिन फ़र्क सिर्फ़ ये है कि ये मुलाक़ात लोहे की सलाखों के आरपार होती है। जेनेट अपनी मां को एक परछाईनुमा चेहरे की तरह देख पाती हैं और बस उनकी उंगलियों को छू पाती हैं।
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ये जगह है कैलिफ़ोर्निया के सैन डिएगो शहर के बाहर अमरीका और मेक्सिको की सीमा पर बना फ्रेंडशिप पार्क। सरहद पर लोहे की जेलनुमा दीवारों के बीच एक छोटा सा कोना, जहां हर शनिवार और रविवार की सुबह सिर्फ़ चार घंटों के लिए कई लातिनी परिवार सरहद पार के अपने परिजनों की आहट सुनने आते हैं।
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जेनेट कहती हैं, "मैं अपने बच्चों से कहती हूं कि अपनी मां से नहीं मिल पाना, उन्हें गले नहीं लगा पाना मेरे लिए बेहद मुश्किल होता है। लेकिन ये कीमत मैं तुम्हारी बेहतर ज़िंदगी के लिए चुका रही हूं।" इन मुलाकातों में थोड़े आंसू, थोड़ी हंसी, गिले-शिकवे सब कुछ होता है. लेकिन जालियों के पार से हमेशा यही सवाल होता है कि तुम्हारे कागज़ कब बनेंगे? जेनेट की तरह यहां आनेवाले ज़्यादातर परिवारों के पास ऐसे दस्तावेज़ नहीं हैं कि वो सरहद पार करके वापस आ सकें।
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अमेरिका में ऐसे लाखों लोग हैं जो बरसों पहले बग़ैर दस्तावेज़ के यहां आए, या फिर वीज़ा खत्म होने के बाद यहां रह गए। कुछ बाल-बच्चों के साथ आए थे, कई के बच्चे यहां पैदा हुए और अमेरिकी नागरिक बन गए, लेकिन मां-बाप "ग़ैर-कानूनी" बने रहे। लाखों ऐसे परिवार हैं जिनके बच्चे यहां हैं, लेकिन मां-बाप पुलिस की चपेट में आए और उन्हें सरहद पार भेज दिया गया।

 

अमरीका में इमिग्रेशन नियमों में सुधार की कई कोशिशें हुई लेकिन...

immigration rule issue in America
लाखों के आर पार
अमरीका में इमिग्रेशन नियमों में सुधार की कई कोशिशें हुई लेकिन राजनीति आड़े आती रही, ख़ासतौर से रिपबलिकन पार्टी की राजनीति, जहां कई लोगों का मानना है कि इमिग्रेशन ने अमरीका को कमज़ोर किया है। ओबामा ने एक सरकारी आदेश के ज़रिए ऐसे लाखों लोगों को एक रोज़गार कार्ड दिया जिससे वो छिपकर रहने कि बजाय, सार्वजनिक तौर पर बाहर आएं, टैक्स दें और नागरिकता की कतार में शामिल हो जाएं।

कार्ड एक तरह की गारंटी है कि उन्हें वापस नहीं भेजा जाएगा। लेकिन इस चुनावी मौसम में डॉनल्ड ट्रंप ने न सिर्फ़ बग़ैर दस्तावेज़ वाले सभी लोगों को वापस भेजने का एलान किया है बल्कि सरहद पर एक ऐसी दीवार बनाने का एलान किया है जिसे कोई लांघ न सके। उनकी दलील है कि ओबामा की कार्रवाई एक तरह से लोगों को क़ानून का उल्लंघन करने के लिए इनाम दे रही है.

ट्रंप के इस एलान की वजह से इस रोज़गार कार्ड के बावजूद कई लोग सहमे हुए सामने आते हैं और जेनेट की तरह ही अपना पूरा नाम बताने में हिचकिचाते हैं क्या पता नई हुकूमत के बाद कहीं उन्हें फिर से लुक-छिप कर न रहना पड़े? जेनेट कहती हैं, "हम कोई अपराधी नहीं हैं, बुरे लोग नहीं हैं. अपने देश में मौका नहीं था तो एक बेहतर ज़िंदगी के लिए यहां आ गए. ट्रंप की बातें सुनकर दिल घबराने लगता है। गौरतलब है कि ट्रंप की राष्ट्रपति पद की दावेदारी में एक नई दीवार के वादे का अहम योगदान रहा है, लेकिन कैलिफ़ोर्निया से टेक्सस तक फैली सरहद पर पहले से ही ज़्यादातर हिस्सों में लोहे की सलाखों वाली दीवारें मौजूद हैं।

लगभग 20,000 पैट्रोलिंग एजेंट्स और ड्रोंस के ज़रिए इन पर पैनी नज़र रखी जाती है। शायद ही कोई दिन गुज़रता है जब कोई इन दीवारों को पार करने की कोशिश नहीं करता हो. एक ने तो हमारे वहां रहते-रहते ही कोशिश की, लेकिन बॉर्डर पैट्रोल (सीमा पर गश्त लगाते सुरक्षाकर्मी) की नज़र से बच नही सका।

कई जगह एक मिनट के अंदर जालियां काट दी जाती हैं लेकिन बॉर्डर पेट्रोल एजेंट जेम्स नील्सन का कहना है कि दीवार की वजह से घुसपैठ में काफ़ी कमी आई है। लेकिन दीवार के जितने करीब जाएं, वहां रहने वाले लोग एक नई दीवार के प्रस्ताव और कामयाबी पर सवाल उठाते हैं। कई ने हमसे कहा कि जब तक सरहद के पार ज़िंदगी बेहतर नहीं होती, लोग इस तरफ़ आने की कोशिश करते ही रहेंगे। ख़ासतौर से तब, जब मेक्सिको के मकानों की खिड़कियों से अमरीका का खाता-पीता चेहरा चौबीसों घंटे नज़र आता हो। मुझे दस्तावेज़ों के साथ अमरीका से मेक्सिको के अंदर पैदल घुसने में मुश्किल से बीस मिनट लगे. मेक्सिको के तिओवाना शहर में घुसते ही एहसास हुआ कि फर्स्ट वर्ल्ड और तथाकथित थर्ड वर्ल्ड इतने करीब भी हो सकते हैं।

दीवार की दूसरी तरफ़ शोर था, भीड़ थी, छोटे-बच्चे सड़कों पर सामान बेच रहे थे, खरीददारी में मोल-भाव हो रहा था, टैक्सीवालों के बीच ग्राहकों को पकड़ने के लिए धक्कमपेल चल रही थी, आवारा कुत्ते सड़कों पर नज़र आ रहे थे, मुर्गों की बांग सुनाई दे रही थी। वहां रहनेवाले जेसुस (पूरा नाम उन्होंने भी नहीं बताया) का कहना था कि जब लोग एक बेहतर ज़िंदगी की तलाश में घर छोड़ देते हैं तो भले ही सरहद के नीचे से सुरंग ही क्यों न बनानी पड़े, वो उस पार जाने की कोशिश करते रहेंगे।

 

अगर डोनल्ड ट्रंप जीत गए ...

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डोनाल़्ड - फोटो : Getty Images
दुनिया के कई कोनों से आए हुए लोग तिओवाना में इंतज़ार कर रहे होते हैं कभी कोहरे का, कभी अंधेरे का, कि मौका पाते ही दूसरी तरफ़ छलांग लगा सकें। जेसुस कहते हैं, "जो घुस पाते हैं वो भी ऐसे काम करते हैं जो आम अमरीकी नहीं करते. अगर डोनल्ड ट्रंप जीत गए और इन लोगों को बाहर भेज दिया तो अमरीकी अर्थव्यवस्था नाली में चली जाएगी।"

देखा जाए तो ओबामा प्रशासन के दौरान भी 25 लाख लोगों को सरहद पार डिपोर्ट किया गया है, ख़ासतौर से उन्हें जो क़ानून तोड़ते हुए पाए गए, भले ही वो ट्रैफ़िक नियमों का छोटा सा उल्लंघन ही क्यों न हो। ट्रंप एक करोड़ से ज़्यादा को डिपोर्ट करने की बात कर रहे हैं।

कई लोग दीवार को उन अमरीकी उसूलों के ख़िलाफ़ मानते हैं जिनकी बुनियाद पर अमरीका बना था. इस देश को एक तरह से बाहर से आए लोगों ने ही बनाया है। लेकिन जो ट्रंप की बात का समर्थन कर रहे हैं उनका कहना है कि अगर सरहदें मज़बूत नहीं की गईँ तो अमरीकी क़ानून का डर खत्म हो जाएगा, अमरीका कमज़ोर हो जाएगा। सरहद के पास ही एक शहर हंकूबा में रहने वाले जॉन होग का कहना था कि मीडियावाले उन जैसे लोगों को विलेन की तरह पेश कर रहे हैं।

कहते हैं, "ज़रा सोचिए अगर सरहद नहीं होगी, तो देश क्या रहेगा?"लातिनी-अमरीकी मूल के लोगों के लिए इमिग्रेशन सबसे अहम चुनावी मुद्दों में से है और ट्रंप की दीवार ने सबसे ज़्यादा उन्हें ही परेशान किया है. कई राज्यों में इनके वोट राष्ट्रपति पद की रेस में अहम भूमिका निभाएंगे।

देखा जाए तो आज अमरीका उस दोराहे पर है जहां एक सोच ऊंची होती दीवारों को अपनी बेहतरी का रास्ता मानती है. दूसरी ओर वो हैं जो दीवारों के बावजूद नए रास्ते तलाशने की कोशिश में लगे हैं। ये चुनाव काफ़ी हद तक उन्हीं दोनों सोच के बीच की जंग है.
 
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