हेडली को 35 साल की सजा सही सजा नहीं: जज

बीबीसी हिंदी Updated Fri, 25 Jan 2013 04:05 PM IST
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अमेरिका में शिकागो स्थित इलिनॉय की जिला अदालत में 52 वर्षीय डेविड हेडली को 35 साल की कैद की सजा सुनाते हुए जज हैरी लीनेनवेबर ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।
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हेडली पर अपना फैसला सुनाते हुए जज लीनेनवेबर ने कहा कि हेडली आतंकवादी हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि उन्होंने एक गंभीर अपराध किया है, लेकिन इस मामले में उन्होंने पुलिस के साथ पूरा सहयोग किया और अदालत को अहम जानकारियां दीं हैं, इसलिए उन्हें 35 साल कैद की सजा दी जाती है।
'मुझे यकीन नहीं..'
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक जज लीनेनवेबर ने कहा कि उन्होंने अपराध किया, फिर अदालत के साथ सहयोग किया और इस सहयोग के लिए उन्हें ईनाम मिला। मैं कितनी भी बड़ी सजा का फैसला सुनाऊं, चरमपंथियों पर उसका कोई असर नहीं होगा। मुझे हेडली की इस बात पर कोई भरोसा और यकीन नहीं कि वो अब बदल चुके हैं।

जज हैरी लाइननवेबर ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि जो सजा मैं हेडली को दे रहा है, उसके बाद वो आजीवन जेल में रहेंगे। उन्होंने कहा कि मैं मानता हूं कि कि आम लोगों को डेविड हेडली से बचाना और उन्हें फिर चरमपंथी गतिविधियों में शामिल न होने देना मेरा कर्त्तव्य है।

35 साल की सजा, सही सजा नहीं... लेकिन मैं सरकार की ओर से उन्हें मौत की सजा न दिए जाने की पैरवी को मानते हुए उन्हें 35 साल की सजा सुनाता हूं।

लीनेनवेबर के मुताबिक डेविड डेडली की ओर से इस मामले में किए गए सहयोग, उनकी ओर से भविष्य में मिलने वाली खुफिया जानकारियां, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी अहम जानकारियां और दूसरे अदालती मामलों में उनकी गवाही की जरूरत को देखते हुए उन्हें मौत की सजा नहीं सुनाई जा रही है।

मुंबई बम धमाकों में भूमिका
लीनेनवेबर ने फैसले में कहा कि मुंबई बम धमाकों के दोषियों को सजा दिलाने और पीड़ितों के साथ न्याय की दिशा में ये सजा एक अहम पड़ाव है। इस मामले की जांच में जो लोग भी साथ आए उन सभी का उन्होंने धन्यवाद दिया।

अदालती कार्रवाई के दौरान हेडली पर भारत में कई जगहों पर धमाकों का षड्यंत्र रचने, भारत में लोगों की हत्या और उनहें विकलांग बनाने के षड्यंत्र में शामिल होने, भारत में मौजूद अमेरिकी नागरिकों की हत्या में शामिल होने, डेनमार्क में चरमपंथ को बढ़ावा देने और लोगों की हत्या की साज़िश रचने और चरमपंथी संगठन लश्करे-तैयबा की मदद का दोषी पाया गया है।

हेडली ने अपने बयान में माना कि उन्होंने लश्कर के इन शिविरों में प्रशिक्षण पाया, ''2002 में जिहाद और उसका जरूरत से जुड़ा तीन हफ्ते का एक कोर्स, अगस्त 2002 में हथियारों और ग्रेनेड के इस्तेमाल के लिए तीन हफ्ते का प्रशिक्षण, अप्रैल 2003 में अपनी सुरक्षा के लिए हथियारों के इस्तेमाल और विपरीत हालात में ज़िंदा रहने का प्रशिक्षण और अंत में ज़मीनी जानकारियां हासिल करने का प्रशिक्षण प्राप्त किया।''

डेनमार्क में हुए चरमपंथी हमले
साल 2005 में भारत जाकर जानकारियां हासिल करने का निर्देश मिलने के बाद 2006 में हेडली ने दाउद गिलानी से अपना नाम बदलकर डेविड हेडली रख लिया ताकि वो भारत खुद को पाकिस्तानी मूल का अमरीकी नागरिक दिखा सकें और लश्कर के एजेंडे पर काम कर सकें।

डेनमार्क में हुए चरमपंथी हमले को लेकर हेडली ने माना कि 2008 की शुरुआत में लश्कर के एक सदस्य ने उन्हें कोपेनहेगन और डेनमार्क के उस अखबार के दफ्तर का मुआएना करने का निर्देश मिला जिसने पैगंबर मोहम्मद के कार्टून छापे। इस जानकारियों को इकट्ठा करने का मकसद इस अखबार के दफ्तर को बम से उड़ाना था।

डेविड हेडली कैद से रिहा होने के बाद पांच साल तक निगरानी में रहना होगा। अमेरिकी कानून के मुताबिक किसी भी हालत में दोषी को अपने सजा काल का 85 फीसदी समय कैद में बिताना ही होता है।

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