पैसों के दम पर भारत को धीरे-धीरे 'घेर' रहा चीन, फैला रहा अपना जाल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चीन दुनिया के जरूरतमंद देशों को कर्ज के जाल में फंसाकर वहां अपना प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश में है। एशिया में कई ऐसे देश हैं, जहां चीन ने विभिन्न महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में धनराशि उपलब्ध करवाई है।
भारत से कुछ ही सैकड़ों मील दूर श्रीलंका का हमबंटोटा बंदरगाह इसी का उदाहरण है। इस बंदरगाह के विकास के लिए चीन ने बड़ी मात्रा में वित्तीय मदद मुहैया कराई और इसका उद्देश्य श्रीलंका को अपने ऋण जाल में फंसाना है। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक लेख में यह दावा किया गया है।
लेख के मुताबिक, चीन की चालों को समझने के लिए किए गए एक अध्ययन से निष्कर्ष निकाला गया है कि यह बंदरगाह चीन को छोड़ किसी अन्य देश या खुद श्रीलंका के लिए भी फायदेमंद साबित नहीं होगा। क्योंकि चीन इससे सिर्फ अपने हित साधेगा।
लेख में कहा गया है कि भारत अपने पड़ोसी श्रीलंका को कई अवसरों पर वित्तीय मदद मुहैया करा चुका है। लेकिन इस परियोजना के लिए उसने ऋण देने से मना कर दिया था, जिसके बाद चीन ने श्रीलंका ओर मदद का हाथ बढ़ाया। लेकिन यह मदद कम और खुद के रणनीतिक फायदे के लिए अधिक था। इस बंदरगाह का विकास श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में शुरू हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक, राजपक्षे ने जब भी चीन की ओर मदद के लिए हाथ फैलाया, उन्हें जरा भी निराशा हाथ नहीं लगी।
करना पड़ा बीजिंग के हवाले
यहां चीन का दखल व प्रभाव इस कदर बढ़ गया कि श्रीलंका सरकार को मजबूरन दिसंबर 2017 में हमबंटोटा बंदरगाह को चीन के हवाले करना पड़ा। साथ ही श्रीलंका ने इसके आसपास की 15 हजार एकड़ जमीन का हिस्सा भी चीन के हवाले कर दिया। इसकी वजह से चीन को भारतीय तटों से महज कुछ सौ मील दूर तक की भूमि पर नियंत्रण हासिल हो गया।
राजपक्षे के चुनाव अभियान के लिए आए पैसे
रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका में 2015 में हुए चुनाव के दौरान बंदरगाह निर्माण से जुड़े चीनी पक्ष की ओर से राजपक्षे के चुनाव अभियान को बड़ी मात्रा में धनराशि दी गई थी। श्रीलंका आज चीन से मिले कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। श्रीलंका पर यह कर्ज अब तक का सबसे बड़ा ऋण है।