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अमेरिका में चुनाव के बाद सदमे में क्यों हैं जानवर?

Sat, 08 Nov 2014 12:43 PM IST
Updated Sat, 08 Nov 2014 12:43 PM IST
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animal symbols in american election

अमेरिका में जब चुनाव होते हैं तो लगता है जैसे बेचारे जानवरों की शामत आ जाती है। एक तो रिपब्लिकंस ने अपना चुनाव चिन्ह हाथी रखा हुआ है और डेमोक्रैट्स ने गदहा। जिसे देखो वो इन दोनों में से किसी एक की पीठ पर ठप्पा लगाकर चल देता है।

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एक डेमोक्रैट उम्मीदवार ने तो इस बार रिपबलिकंस पर गुस्सा उतारने के लिए बड़े से हाथी का पुतला बनाया और उस पर दनादन गोलियां दागने लगे और फिर एक तस्वीर बनवाई जिसमें वो एक गदहे को घसीटते हुए कैपिटॉल हिल ले जा रहे हैं।
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हाथी और गदहों को तो आदत पड़ चुकी है इस इमोशनल अत्याचार की, लेकिन एक रिपबलिकन महिला उम्मीदवार ने जो किया है उससे तो पूरे देश के सूअर डिप्रेशन में चले गए हैं।
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ये महिला हैं अति दक्षिणपंथी रुझान वाली जोनी अर्न्स्ट जिन्होंने अपने चुनाव प्रचार में जो विज्ञापन जारी किया उससे उनकी किस्मत बदल गई।

इस टीवी विज्ञापन में बेचारे मायूस पड़े हुए कुछ सूअरों को वो दिखाती हैं और कहती हैं बचपन में मैं अपने फार्म पर सूअरों की नसबंदी करती थी। अगर आपने मुझे जिता दिया तो मैं वाशिंगटन में पोर्क यानि सूअर के मांस को कैसे काटना है ये अच्छे से जानती हूं।

सुअरों से निकलवाएंगी चीखें

animal symbols in american election

अमेरिका की राजनीतिक भाषा में पोर्क का मतलब होता है एक तरह का छिपा हुआ बजट जो किसी बिल पर अपने वोट के बदले कई सेनेटर चुपचाप से अपने इलाके के लिए पास करा लेते हैं।

तो इस पोर्क को काटने की बात तो जोनी अर्न्स्ट ने की ही, साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि मुझे वाशिंगटन भेजो, मैं सूअरों की तरह चीखें निकलवाऊंगी। अब तो वो जीत गई है। वाशिंगटन पहुंच कर वो किसकी और कैसे चीखें निकलवाएंगी ये तो कांग्रेस वाले जानें लेकिन जरा सोचिए सूअरों पर क्या बीत रही होगी।

एक तो पहले से ही वो परेशान रहते हैं। बचपन में कोई पूछता है कि बेटे बड़े होकर क्या बनोगे तो कहना पड़ता है कि सॉसेज में ठूसा जाऊंगा या फिर पित्जा पर मेरे छोटे-छोटे गोल-गोल टुकड़े बिखेरे जाएंगे।

खैर सूअरों की छोड़िए, अब हिरणों की बात कर लीजिए।

हिरणों की बात

animal symbols in american election

सैरा पेलिन, याद हैं न आपको? जॉन मैक्कैन ने उन्हें अपना उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था और उनकी राजनीति से ज़्यादा उनकी ख़ूबसूरती की चर्चा होती थी।

और उनके जो विज्ञापन होते थे उनमें वो बिल्कुल रानी हंटरवाली पोज में हिरणों का शिकार करती हुई दिखाई जाती थीं और फिर बड़े से चाकू से उस अमेरिकी हिरण की खाल उतार रही होती थीं। कहते हैं अमेरिकी हिरण अभी तक उस सदमे से उबर नहीं पाए हैं।

जहां भी रिपब्लिकंस की हवा बहती है वहां डेमोक्रैट्स हों या रिपब्लिकन दोनों ही बंदूक रखने के हक़ में बात करते हैं और हाथ में बंदूक हो तो निशाने पर जानवर ही आते हैं।

इस चुनाव में तो कुछ राज्यों में इस बात पर भी वोटिंग हुई है कि भालू, भेड़िया और हिरण के शिकार को मंजूरी दी जाए। पूरी दुनिया में मानवाधिकारों का ठेका लेने वाले अमेरिका में इन जानवरों की कोई नहीं सोचता। और तो और राजनीतिक भाषा में भी जानवरों की खिल्ली उड़ती है।

ओबामा अपनी हुकूमत के आख़िरी दौर में हैं तो उन्हें “लेम डक” कहा जा रहा है यानि वो लंगड़ा बत्तख जो अपने झुंड के साथ कदम नहीं मिला पाता तो बाकी उसे पीछे छोड़ आगे निकल जाते हैं। पत्रकार अपने को बड़ा सेंसिटिव समझते हैं लेकिन उन्हीं में से एक ने रिपब्लिकंस के लिए लिखा है:

“रिपब्लिकंस उस कुत्ते की तरह हैं जो कार के साथ-साथ दौड़ लगाता है लेकिन जब आगे निकल जाता है तो उसे समझ में नहीं आता कि अब क्या करना है।” कुत्ते को इतना नासमझ कहना कहां तक सही है? ख़ैर हमें क्या हक़ बनता है उंगली उठाने का।

हमारे यहां तो ख़ुद ही जब गब्बर सिंह को ग़ुस्सा आता है तो वो चिल्लाते हैं, 'सूअर के बच्चों...'। जब धर्मेंद्र को गुस्सा आता है तो वो चीखते हैं, 'कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा।'

सचमुच, बहुत नाइंसाफी है!

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