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अमेरिका से शांति समझौता करने वाला तालिबान कौन है... क्या ये उसकी जीत है?

Sun, 01 Mar 2020 04:48 AM IST
गौरव पाण्डेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: गौरव पाण्डेय Updated Sun, 01 Mar 2020 04:48 AM IST
सार

दो दशक से युद्ध और हिंसा से जूझ रहे अफगानिस्तान में शांति की उम्मीद जगी है। शांति समझौते से लोग खुश हैं और उन्हें अमन लौटने की आशा है। हालांकि, लोगों में संदेह भी है कि देश में यह शांति लंबे समय तक कायम रहेगी भी या नहीं। 

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America Taliban Peace Deal : know everything about pact and Taliban
दोहा में अमेरिका के शांति दूत जल्मय खालिजाद और तालिबान नेता मुल्लाह अब्दुल गनी बारादर हाथ मिलाते - फोटो : पीटीआई

विस्तार

9/11 के हमले के बाद 2001 में अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ जंग के लिए अपने सैनिक अफगानिस्तान भेजे थे। लंबी लड़ाई में अब तक 3500 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है और अब अमेरिका अफगानिस्तान से अपने सैनिक वापस बुलाना चाहता है। इस सप्ताह की शुरुआत में शांति समझौते को लेकर सहमति बनने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार रात में शांति समझौते को अंतिम रूप देने की अनुमति दे दी। 19 साल लंबे चले संघर्ष के बाद भी अमेरिका तालिबान को खत्म नहीं कर पाया।

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1990 का दशक...

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने मदरसों के अफगान छात्रों को भड़काकर 1990 के दशक में सोवियत सेनाओं के खिलाफ तालिबान को जन्म दिया। इसे सऊदी अरब से पैसा मिलता था। सोवियत संघ के अफगानिस्तान से लौटने के बाद वहां अलग-अलग गुटों के बीच संघर्ष शुरू हो गया।

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इसलिए लोकप्रिय हुआ

1994 के आसपास जब तालिबान पहली बार अफगानिस्तान के पटल पर उभरा तो उसने पाकिस्तान की सीमा से लगे पश्तूनों के इलाके में शांति-सुरक्षा बहाल करने का वादा किया। उसने सत्ता में आने पर उसने शरिया कानून लागू करने की भी बात कही। तालिबान ने भ्रष्टाचार पर भी नकेल कसी।

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तेजी से बढ़ाया प्रभाव क्षेत्र

दक्षिणी-पश्चिमी अफगानिस्तान से आगे बढ़ते हुए सितंबर,1995 में तालिबान ने ईरान की सीमा से लगे हेरात पर कब्जा कर लिया। एक साल बाद लड़ाकों ने तत्कालीन राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी को बेदखल कर काबुल पर कब्जा कर लिया। 1998 तक अफगानिस्तान के 90 फीसदी हिस्से पर तालिबान का राज था।

कट्टरवाद और अत्याचार

तालिबान ने कट्टरवादी इस्लामिक कानूनों को लागू किया। हत्या के आरोपियों को सार्वजनिक फांसी, चोरी पर हाथ-पैर काटने जैसी घटनाएं आम होने लगीं। पुरुषों के लिए दाढ़ी रखना और महिलाओं के लिए नकाब पहनना अनिवार्य हो गया। टीवी, फिल्मों और गानों पर प्रतिबंध लगा। लड़कियों के स्कूल जाने पर भी पाबंदी लगा दी।

पाकिस्तान में तैयार हुए लड़ाके

शुरुआत में अधिकांश तालिबानी लड़ाके पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ने के बाद इसका हिस्सा बने। पाकिस्तान दुनिया के उन तीन देशों में भी शामिल था जिसने तालिबान शासन को मान्यता दी थी।

2001 में अमेरिकी हमला

न्यूयॉर्क में आतंकी हमले के बाद तालिबान दुनिया की नजरों में आया। इसी दौरान 7 अक्टूबर, 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। अमेरिकी सेना ने तालिबान को सत्ता से बेदखल कर दिया। हालांकि, तालिबान नेता मुल्ला उमर और अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पकड़ा नहीं जा सका।

  • समझौते से क्या उम्मीद : उम्मीद है कि तालिबान और स्थानीय सरकार साथ बैठकर बातचीत करने को तैयार होंगे। यह देश में राजनीतिक स्थायित्व और शांति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
  • चुनौतियां अभी खत्म नहीं : विशेषज्ञ शांति समझौते के लिए बातचीत की प्रक्रिया में देरी के लिए अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और मुख्य कार्यकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच मतभेदों को जिम्मेदार मानते हैं और समझौता होने के बाद भी यह बड़ी चुनौती होगी। पिछले सप्ताह घोषित राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों में गनी की जीत को अब्दुल्ला ने मानने से इंकार कर दिया था।
  • क्या तालिबान की जीत हुई : तालिबान अफगानिस्तान में विदेशी सेनाओं की मौजूदगी का विरोध करता रहा है। 2018 में अमेरिका ने शर्त रखी थी कि सेनाएं तभी वापस जाएंगी जब तालिबान आतंकी हमले नहीं होने का विश्वास दिलाए। तालिबान इसे अपनी जीत बता रहा है, लेकिन समझौते के लिए सभी पक्षों को समझौता करना पड़ा है।

 

करार से पहले तालिबान ने लड़ाकों को दे दिया था हमले रोकने का आदेश

तालिबान ने समझौते से पहले अपने लड़ाकों को अफगानिस्तान में कोई भी हमला नहीं करने का आदेश दिया था। तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने शनिवार को कहा, देश की खुशी के लिए आज तालिबान के लड़ाकों को किसी भी हमले से दूर रहने को कहा गया है।

कुछ ऐसा है तालिबान का सत्ता संगठन

रहबरी शूरा-तीसरे नंबर पर 18 से ज्यादा सदस्यों वाली नेतृत्व परिषद है जिसे रहबरी शूरा कहते हैं। संगठन के लिए नीति-रणनीति बनाने के साथ अन्य महत्वपूर्ण फैसले लेने की जिम्मेदारी नेतृत्व परिषद की है। इसके सदस्यों में तालिबान के राजनयिक, पूर्व मंत्री, सूबे के पूर्व प्रशासक, सैनिक कमांडर और धार्मिक शख्सियतें शामिल हैं।

  • अमीर-मुल्ला हिबातुल्ला अखूनजादा : राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य मामलों में अंतिम फैसला अखूनजादा का ही होता है। रहबरी शूरा परिषद का प्रमुख भी है।
  • उप प्रमुख-सिराजुद्दीन हक्कानी और मुल्ला मोहम्मद याकूब : हक्कानी संगठन की सैन्य गतिविधियों के संचालन का काम देखता है और हक्कानी नेटवर्क का प्रमुख भी है। मुल्ला मोहम्मद याकूब तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर का बेटा है।
  • कमीशन (कैबिनेट) : नेतृत्व परिषद के नीचे करीब एक दर्जन कमीशन होते हैं जो तालिबान के मंत्रालय की तरह काम करते हैं। वित्त, स्वास्थ्य, सैन्य मामले, राजनीतिक मामले, शिक्षा आदि के लिए अलग मंत्रालय हैं।
  • फील्ड कमांडर और शैडो गवर्नर : इनका काम संगठन के लिए जमीनी हमलों को अंजाम देना है। इन्हें एक से दूसरे विभाग में स्थानांतरित भी किया जाता है।
  • अखूनजादा शीर्ष कमांडर : 2015 में तालिबान ने माना कि उसने मुल्ला उमर की मौत की खबर को दबाए रखा। मुल्ला मंसूर नया कमांडर बना। 2016 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मंसूर की मौत के बाद हिबातुल्ला अखूनजादा नया कमांडर बना।

 

समझौते को लेकर आशा के साथ संदेह भी

दो दशक से युद्ध और हिंसा से जूझ रहे अफगानिस्तान में शांति की उम्मीद जगी है। शांति समझौते से लोग खुश हैं और उन्हें अमन लौटने की आशा है। हालांकि, लोगों में संदेह भी है कि देश में यह शांति लंबे समय तक कायम रहेगी भी या नहीं। अफगानिस्तान के लोगों ने 80 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ के दौरान में देश में युद्ध और हिंसा को भी झेला है।

पिछले साल आतंकी हमले में पति नासिर अहमद को गंवाने वाली 45 साल की नसीमा ने कहा, जो इस तरह के हमलों को अंजाम देता आया हो उससे शांति की उम्मीद बेकार है। अगर तालिबान शांति को लेकर गंभीर हैं तो मैं अपने साथ हुई घटना और तकलीफों को भूलने को तैयार हूं।

नसीमा के पति नासिर समेत 150 लोग पिछले साल ट्रक विस्फोट में मारे गए थे। 47 साल के हाजी मलिक ने 2016 में अपने 18 साल के बेटे सराजुद्दीन को खो दिया था। मलिक का बेटा तालिबान में शामिल हो गया था और मुठभेड़ में मारा गया था। मलिक को तकलीफ है कि वह अपने बेटे को दफना भी नहीं सके थे।

...तालिबान पर निर्भर होगी सैनिकों की वापसी

यह समझौता शांति का रास्ता खोलेगा। मैं अफगान सैनिकों के बलिदान की सराहना करता हूं। अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी तालिबान के रवैये पर निर्भर होगी।
- अशरफ गनी, राष्ट्रपति, अफगानिस्तान

जल्द तालिबान नेताओं से मिलूंगा

जल्द ही तालिबान नेताओं से मिलूंगा। उम्मीद है कि तालिबान शांति के लिए तैयार हैं, पर समझौता टूटा तो हम फिर वापस आएंगे।
- डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति ,अमेरिका

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