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G20 meets: क्या कर्ज संकट का कोई समाधान निकल पाएगा जी-20 की वाशिंगटन बैठक में?
Fri, 14 Oct 2022 06:46 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 14 Oct 2022 06:46 PM IST
सार
G20 meets: अमेरिका पिछले कई महीनों से ब्याज दर बढ़ाने की नीति पर चल रहा है। ये नीति महंगाई घटाने के लिए अपनाई गई है। लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स दुनिया भर में महसूस किए गए हैं। अमेरिका में अधिक ब्याज मिलने की संभावना के कारण निवेशक उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों से अपना पैसा निकाल कर अमेरिका में निवेश बढ़ा रहे हैं...
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G20 Finance Ministers and Central Bank Governors Meeting in Washington
- फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
दुनिया की निगाहें इस समय यहां शुरू हुई जी-20 के सेंट्रल बैंक प्रमुखों और वित्त मंत्रियों की बैठक पर हैं। दुनिया पर इस समय कर्ज संकट और आर्थिक मंदी की आशंका मंडरा रही है। जी-20 की बुधवार रात शुरू हुई बैठक में इन समस्याओं से निपटने की कोई राह निकल सकेगी, पर्यवेक्षकों की निगाहें इस टिकी हुई हैं।
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इस बैठक के मौके पर थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (आईआईएफ) ने गहराते जा रहे कर्ज संकट पर एक खास रिपोर्ट जारी की है। इसके मुताबिक यह पहला मौका है, जब दुनिया में 31 उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में सरकारों, परिवारों और प्राइवेट सेक्टर उद्यमों पर मौजूद कर्ज 98.8 ट्रिलियन तक पहुंच गया है। ये रकम इन देशों के साझा जीडीपी से ढाई गुना ज्यादा है। यह पहला मौका है, जब ये सकल कर्ज 90 ट्रिलियन से ज्यादा हुआ है। खास कर उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में कर्ज की मात्रा हाल में तेजी से बढ़ी है।
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इस रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज बढ़ने का सबसे प्रमुख कारण डॉलर के भाव में असामान्य बढ़ोतरी है। इस वर्ष मार्च के बाद से डॉलर लगातार मजबूत होता चला गया है। इससे दूसरे देशों की मुद्राएं कमजोर पड़ी हैं। संभावना है कि जी-20 देशों के मंत्री और अधिकारी इस मुद्दे पर खास चर्चा करेंगे।
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अमेरिका पिछले कई महीनों से ब्याज दर बढ़ाने की नीति पर चल रहा है। ये नीति महंगाई घटाने के लिए अपनाई गई है। लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स दुनिया भर में महसूस किए गए हैं। अमेरिका में अधिक ब्याज मिलने की संभावना के कारण निवेशक उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों से अपना पैसा निकाल कर अमेरिका में निवेश बढ़ा रहे हैं। विकासशील देशों की मुद्राओं की कमजोरी का यह प्रमुख कारण है। इस समस्या से निपटने की कोशिश में विकासशील देशों ने भी ब्याज दरें बढ़ाई हैं। लेकिन उससे उनका आर्थिक विकास खतरे में पड़ गया है।
जी-20 ने 2020 में कर्ज चुकाने का कार्यक्रम पुनर्निधारित (डेट रिस्ट्रक्चरिंग) करने के लिए एक कॉमन फ्रेमवर्क बनाया था। चैड, इथियोपिया और जाम्बिया ने इस फ्रेमवर्क के तहत कर्ज राहत मांगी। लेकिन इस मुद्दे पर कर्जदाता देशों में असहमति के कारण बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई है। इस बीच कर्ज संकट से जूझ रहे अफ्रीका और अन्य महाद्वीपों के गरीब देशों में गंभीर खाद्य संकट भी खड़ा हो गया है। आईआईएफ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि बीते सितंबर में 16 देशों में खाद्य संकट गंभीर रूप ले चुका था। ये वही देश हैं, जो कर्ज मुसीबत में भी फंसे हुए हैं।
जी-20 के वित्त मंत्रियो की पिछली दो बैठकें अप्रैल और जुलाई में हुई थीं। लेकिन तब उनमें किसी साझा विज्ञप्ति पर सहमति नहीं बन सकी। विश्लेषकों के मुताबिक यूक्रेन पर रूस के हमले और चीन के साथ पश्चिमी देशों के बढ़ते मतभेदों के कारण जी-20 की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है। वाशिंगटन बैठक पर भी इन मतभेदों का साया पड़ने का अंदेशा है। विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा आर्थिक मुश्किलों के कारण ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2023 के लिए वैश्विक आर्थिक वृद्धि के अनुमान को घटा कर 2.7 फीसदी कर दिया है।