अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी: ज्यादा दिन तक नहीं टिकेगा तालिबान का जश्न!
अफगानिस्तान में बैंकों ने रकम निकालने की सीमा तय कर दी है। उधर सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें महीनों से तनख्वाह नहीं मिली है। गहराते संकट के बीच अधिक से अधिक अफगानी देश छोड़ कर जाने की फिराक में हैं...
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अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी पर तालिबान ने जश्न मनाया। लेकिन अब उसके सामने देश को संभालने की भीषण चुनौतियां हैं। तालिबान ने काफी मात्रा में उन हथियारों और युद्धक साजोसामान को अपने कब्जे में ले लिया है, जो अमेरिकी और नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) के सैनिक यहां छोड़ कर गए हैं। अमेरिकी फौज की वापसी के बाद तालिबान के प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने कहा- ‘दुनिया ने एक सबक सीखा है। यह हमारे लिए जीत का सुखद पल है।’
लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर तालिबान अपने देश पर ठीक से शासन करने को लेकर गंभीर है, तो उसकी ये खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकेगी। उसके सामने बदहाल अर्थव्यवस्था, चरमाए हेल्थ केयर सिस्टम, और कूटनीति को संभालने की गंभीर चुनौतियां हैं। साथ ही देश में तालिबान विरोधी ताकतों ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल पिछले हफ्ते काबुल हवाई अड्डे पर हुए हमले से देखने को मिली, जिसमें 169 अफगान और 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए। ये हमला तालिबान विरोधी आईएसआईएस-के नाम के संगठन ने किया।
अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था जर्जर है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने अफगानिस्तान को मिल रही अंतरराष्ट्रीय सहायता पर रोक लगा दी है। इससे तालिबान सरकार के खजाने में तुरंत नकदी का संकट पैदा होगा। यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने अपने यहां जमा अफगानिस्तान के अरबों यूरो की संपत्ति को जब्त कर लिया है। ईयू ने कहा है कि ये रकम अब तालिबान को तभी मिलेगी, जब वह मानवाधिकारों की रक्षा सहित ईयू की तरफ से रखी गई दूसरी शर्तों का पालन करेगा। अमेरिका ने भी अपने यहां जमा अफगानिस्तान के अरबों डॉलर की रकम को फिलहाल फ्रीज कर दिया है।
यूरोपीय टीवी चैनल यूरो न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन कदमों का असर यह हुआ है कि अफगानिस्तान में बैंकों ने रकम निकालने की सीमा तय कर दी है। उधर सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें महीनों से तनख्वाह नहीं मिली है। गहराते संकट के बीच अधिक से अधिक अफगानी देश छोड़ कर जाने की फिराक में हैं।
इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में मेडिकल उपकरणों की पहले से कमी है। उन्हें इस्तेमाल करने में सक्षम विशेषज्ञों की भी पिछले महीनों में कमी हो गई है। जानकारों के मुताबिक जब तालिबान देश पर कब्जा जमाते हुए आगे बढ़ रहा था, तभी से मेडिकल विशेषज्ञों के देश छोड़ कर जाने का सिलसिला लग गया। उधर लंबे समय से जारी सूखे के कारण अफगानिस्तान के कई इलाकों में खाद्य सामग्रियों की भारी कमी है। अब चूंकि बाहर से अनाज मंगवाना भी मुश्किल हो गया है, इसलिए जानकारों को अंदेशा है कि अफगानिस्तान में भुखमरी की स्थिति बन सकती है।
इस बीच तालिबान के सामने कूटनीतिक मोर्चे पर अपनी वैधता साबित करने की कठिन चुनौती भी है। तालिबान लगातार यह कह रहा है कि वह अमेरिका सहित तमाम देशों के साथ अच्छे संबंध रखना चाहता है। लेकिन अमेरिका और दूसरे विकसित देश यह कह चुके हैं कि वे तालिबान के बारे में अपनी राय उसके व्यवहार को देखते हुए बनाएंगे। अमेरिका और उसके साथ देशों ने कहा है कि अब आतंकवाद को रोकने, महिलाओँ सहित सबके मानवाधिकारों की रक्षा करने, अल्पसंख्यकों की रक्षा करने और सभी पक्षों को शामिल करते हुए अफगानिस्तान में समावेशी सरकार बनाने की जिम्मेदारी तालिबान पर है। इन मामलों में उसका क्या रुख रहता है, इसके आधार पर ही उसके बारे में फैसला लिया जाएगा।