दिल्ली की दमघोंटू बन रही हवा के पीछे स्थानीय कारण जिम्मेदार : ब्रिटिश यूनिवर्सिटी
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भले ही हर साल दिल्ली की दमघोंटू हवा के लिए पंजाब-हरियाणा के किसानों की पराली को जिम्मेदार ठहराया जाता हो, लेकिन सही मायने में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की दूषित हवा स्थानीय कारकों की देन है। यह दावा ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के शोधकर्ताओं ने किया है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि दिल्ली एनसीआर की हवा में हानिकारक वायु प्रदूषकों की मौजूदगी के पीछे ट्रैफिक, भवन निर्माण और घरों में अंगीठी या लकड़ी जलाने आदि का अहम योगदान है।
यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओें ने यह रिपोर्ट तैयार करने के लिए करीब 4 साल तक दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के 12 स्थानों पर प्रदूषण का डाटा रिकॉर्ड किया। साइंस जर्नल सस्टेनबल सिटीज एंड सोसाइटीज में प्रकाशित शोध में यह विश्लेषण किया है कि किस तरह पार्टिकुलेट मैटर (हवा के सूक्ष्म कण) यानी पीएम2.5 और पीएम19 तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइ ऑक्साइड और ओजोन सरीखी गैसें देश के इस हिस्से को प्रभावित कर रही हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के प्रोफेसर प्रशांत कुमार का कहना है कि शोध के दौरान यह स्पष्ट दिखाई दिया कि सर्दी के दिनों में दिल्ली एनसीआर का क्षेत्र गर्मी या मानसून के मुकाबले ज्यादा वायु प्रदूषण से जूझता है।
उन्होंने इसमें सर्दियों के दौरान जलाई जाने वाली पराली का भी योगदान माना, लेकिन उनका कहना है कि घरों में गर्मी पैदा करने के लिए जलाए जाने वाले बायोमॉस (लकड़ी, कोयला) आदि के चलते इससे भी ज्यादा प्रदूषण फैलता है। उन्होंने महज सर्दी के दिनों में किए जाने वाले प्रदूषण नियंत्रक उपायों को पूरा साल चलाए जाने की सिफारिश की है।
देश में हर साल 6 लाख मौत
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2016 के दौरान पूरी दुनिया में करीब 42 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हुई थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसमें से करीब 6 लाख लोग भारत में मारे गए थे। इस दौरान दिल्ली की हवा में कई प्रदूषक तत्वों की दुनिया में सबसे ज्यादा मौजूदगी पाई गई थी।
दिल्ली के कारण आसपास पर भी असर
एक निश्वित समय के दौरान लिए गए आंकड़ों के बारे में हमारा विश्लेषण यह पुष्टि करता है कि दिल्ली क्षेत्र में वायु गुणवत्ता पर प्रदूषण के स्थानीय स्रोत (यातायात और घरों का ताप आदि) जबरदस्त प्रभाव डाल रहे हैं। इसके अलावा, दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में भी सर्दियों की अवधि के दौरान इयकस पर्याप्त प्रभाव पड़ रहा है।
प्रशांत कुमार, प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ सरे