दुनियाभर की करीब 70 फीसदी आबादी के लिए बढ़ रही विषमता, व्यापक सुधार जरूरी
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संयुक्त राष्ट्र की एक ताजी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या के लिए विषमता बढ़ रही है जिससे समाजों में दरारें पड़ने और आर्थिक व सामाजिक विकास के बाधित होने का जोखिम बढ़ रहा है। मंगलवार को जारी विश्व सामाजिक रिपोर्ट 2020 संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक व सामाजिक मामलों के विभाग (डेसा) ने प्रकाशित की है।
इसमें दिखाया गया है कि ज्यादातर विकसित देशों और कुछ मध्य आय वाले देशों में आय असमानता बढ़ी है। इन देशों में चीन भी शामिल है जिसे विश्व में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश कहा जाता है।
यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने इस रिपोर्ट की प्रस्तावना में चुनौतियों का जिक्र करते हुए लिखा है कि विश्व के सामने इस समय बहुत गहरे विषम वैश्विक पटल की चुनौती दरपेश है, जिसमें आर्थिक चिंताओं, विषमताओं और रोजगार असुरक्षा के कारणों से व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं, और ऐसा विकसित व विकासशील दोनों ही देशों में हो रहा है।
महासचिव ने प्रस्ताव में लिखा है, 'आय में असमानता और रोजगार के असवरों की कमी के कारण विषमताओं का कुचक्र बन रहा है जिससे सभी पीढ़ियों में हताशा और निराशा घर कर रही है।' ये रिपोर्ट दिखाती है कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में आबादी का केवल एक प्रतिशत धनी हिस्सा ही बड़ा विजयी नजर आता है। इस हिस्से ने 1990 से 2015 के बीच अपनी संपदा की हिस्सेदारी बहुत बढ़ाई है।
जबकि दूसरी तरफ समाज के निचले स्तर पर रहने वाले लगभग 40 प्रतिशत लोगों की कुल आमदनी उस धनी समूह का केवल लगभग 25 प्रतिशत के बराबर होता है। ये हालात उन सभी देशों में देखे गए हैं जहां सर्वे किया गया। रिपोर्ट कहती है कि समाजों में व्याप्त इस असमानता के अनेक नतीजों में से आर्थिक प्रगति का धीमा हो जाना भी होता है।
असमान समाजों में स्वास्थ्य व शिक्षा सेवाओं में व्पायक असमानता होता है और ऐसे हालात में लोगों के गरीबी के दलदल में कई पीढ़ियों तक फंसे रहने की बहुत ज्यादा संभावना होती है।
देशों के मध्य औसत आमदनी का अंतर कम हो रहा है, चीन और अन्य एशियाई देश वैश्विक अर्थव्यवस्था की प्रगति में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसके बावजूद धनी व गरीब देशों और क्षेत्रों के बीच बहुत तीखे अंतर भी हैं। मसलन, उत्तर अमेरिका में औसत आमदनी सब सहारा अफ्रीका क्षेत्र के देशों के में रहने वाले लोगों की तुलना में 16 गुना ज्यादा है।
चार वैश्विक कारक
रिपोर्ट में कहा गया है कि चार ऐसे सबसे शक्तिशाली कारक हैं जो दुनिया भर में असमानता पर सबसे ज्यादा असर डाल रहे हैं, इन्हें मेगाट्रेंड भी कहा जाता है। ये हैं - प्रोद्योगिकी नवाचार, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और आंतरिक प्रवासन।
टेक्नोलॉजी नवाचार जहां एक तरफ स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, संचार और उत्पादकता जैसे क्षेत्रों में नए अवसर मुहैया कराकर आर्थिक वृद्धि को सहारा दे सकता है, वहीं ऐसे सबूत भी सामने आए हैं कि इससे लोगों के वेतन या मेहनताना में असमानता बढ़ती है और बहुत से कामगारों को विस्थापित भी होना पड़ता है।
बायोलॉजी और जेनेटिक्स के साथ-साथ रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसे क्षेत्रों में तेजी से हो रही प्रगति समाज को बहुत तेजी से बदल रही है। नई टेक्नोलॉजी में बहुत से कामकाजों में लोगों की भूमिका को पूरी तरह से खत्म करने की भी क्षमता मौजूद है लेकिन साथ ही इसके जरिए नए कामकाज, और नवाचार भी उत्पन्न हो सकते हैं।
फिलहाल, हालांकि उच्च कौशल व हुनरमंद लोग इस दौर के बहुत फायदे उठा रहे हैं जिसे 'चौथी औद्योगिक क्रांति' भी कहा जाता है। जबकि कम कुशल और मध्य स्तर के कुशल कामकाजी लोग साधारण कामकाज में लगे हुए हैं और उन्हें अपने कामकाजी अवसर कम होते नजर आ रहे हैं।
जैसा कि गुरुवार, 16 जनवरी 2020 को वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया था कि जलवायु परिवर्तन भी जीवन की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर डाल रहा है। पर्यावरण क्षय और मौसम की चरम घटनाओं का सबसे ज्यादा असर कमजोर स्थितियों में रहने वाले लोगों पर पड़ रहा है।
विश्व सामाजिक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन विश्व के निर्धन देशों को निर्धनतम बना रहा है और इसके कारण वो प्रगति पलट सकती है जो देशों ने असमानता कम करने के लिए अभी तक हासिल की है। जलवायु संकट का सामना करने के लिए अगर उम्मीद के अनुसार कार्रवाई हुई तो कार्बन उत्सर्जन वाले क्षेत्रों में कामकाज के अवसर कम होंगे और इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है – कोयला उद्योग।
लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था को हरित ऊर्जा बनाने के प्रयासों की बदौलत उतने की कामकाजी अवसर उत्पन्न भी हो सकते हैं। और ये नए कामकाजी अवसर पूरे विश्व में होंगे। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में ज्यादा लोग रहते हैं। ये रुझान आने वाले दशकों में जारी रहने की संभावना है।
शहर अलबत्ता आर्थिक वृद्धि को तेज करते हैं, लेकिन उनमें गांवों की तुलना में ज्यादा असमानता भी होती है। शहरों में बहुत ही धनी लोगों के पास ही बहुत गरीब लोग भी रहते हैं। असमानताओं का ये स्तर हर शहर में अलग-अलग होता है जोकि एक ही देश में भी बहुत अलग-अलग देखा गया है। ये शहर जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं और इनका विकास होता है, वहां असमानता और ज्यादा बढ़ती है, जबकि दूसरी तरफ ऐसे शहर में हैं जहां असमानता कम हुई है।
प्रवासन वैश्विक असमानता का चिन्ह
चौथा मेगाट्रेंड – अंतरराष्ट्रीय प्रवासन है जिसे 'वैश्विक असमानता का ताकतवर प्रतीक' और साथ ही 'सही परिस्थितियों में समानता के लिए एक ताकत' भी कहा जाता है। रिपोर्ट कहती है कि जब देशों विकास और औद्योगिकरण होना शुरू हो जाता है तो देशों के बीच प्रवासन बढ़ने का रुझान होता है। इस तरह कम आमदनी वाले देशों की तुलना में मध्य आय वाले देशों के लोग विदेशों के लिए ज्यादा प्रवासन करते हैं।
आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय प्रवासन को प्रवासियों, उनके मेजबान देश और उनके मूल देश सभी के लिए फायदेमंद समझा जाता है क्योंकि वो अपने मूल स्थानों को धन भी भेजते हैं और जहां रहकर काम करते हैं वहां तो फायदा पहुंचता ही है। कुछ मामलों में ऐसा देखा गया है कि जहां प्रवासी लोग कम हुनर वाले काम के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल होते हं तो वहां वेतन या मेहनताना घटाया भी जाता है, जिससे असमानता बढ़ती है।
लेकिन प्रवासी लोगों के पास अगर ज्यादा कौशल व हुनर होता है और उनकी संख्या मांग की तुलना में कम होती है, या फिर वो ऐसा काम करने के लिए तैयार हों जो अन्य स्थानीय लोग नहीं करते हैं तो इसका उनकी बेरोजगारी की स्थिति में सुधारात्मक असर पड़ सकता है। रिपोर्ट कहती है कि देशों में असमानता को दूर करना नीति निर्माण में बहुत अहम घटक होना चाहिए।
इसका मतलब है कि नई टेक्नोलॉजी की संभावनाओं को गरीबी दूर करने और कामकाज व रोजगार के अवसर उत्पन्न करने के लिए किया जाए; कमजोर तबके के लोगों को जलवायु संकट के प्रभावों के खिलाफ ज्यादा मजबूत बनने मौक़े मिलें; शहर ज्यादा समावेशों हों; और प्रवासन एक सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित माहौल में हो।