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Badrinath Temple: बदरीनाथ धाम में नहीं बजाया जाता है शंख, जानें क्या है इसके पीछे की मान्यता

Tue, 18 May 2021 11:09 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रुस्तम राणा Updated Tue, 18 May 2021 11:09 AM IST
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Badrinath Temple know shank story of the Badrinath Dham
बदरीनाथ धाम - फोटो : अमर उजाला

देवभूमि उत्तराखंड में स्थित बदरीनाथ धाम के कपाट आज मंगलवार को ब्रह्ममुहूर्त में पुष्य नक्षत्र और वृष लग्न में 4 बजकर 15 मिनट पर खोल दिए गए। यह प्रसिद्ध मंदिर भगवान विष्णु जी को समर्पित है। इस मंदिर में जगत के पालनहारा भगवान विष्णु जी के रूप बदरीनारायण की पूजा होती है। कोरोना संक्रमण को देखते हुए पुजारियों सहित कुछ विशेष लोगों को मंदिर के अंदर जाने की अनुमति दी गई। मंदिर के कपाट खुलते ही जय बदरीनाथ के जयघोष से धाम गुंजायमान हो उठा।

Badrinath Temple know shank story of the Badrinath Dham
बद्रीनाथ मंदिर (गोले में शंख की प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media/pixabay
बदरीनाथ मंदिर में नहीं बजाया जाता है शंख

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को शंख की ध्वनि प्रिय लगती है, लेकिन उनके धाम बदरीनाथ में शंख नहीं बजाया जाता है। सभी मंदिरों में शंख की ध्वनि से देवी देवताओं का आह्वान किया जाता है, लेकिन हिमालय की तलहटी पर विराजमान बदरीनाथ धाम में शंखनाद नहीं होता है।

Badrinath Temple know shank story of the Badrinath Dham
बदरीनाथ धाम - फोटो : अमर उजाला
रुद्रप्रयाग के सिल्ला गांव से जुड़ी है मान्यता

धार्मिक कथाओं के अनुसार इसके पीछे एक प्राचीन मान्यता है जो रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के सिल्ला गांव से जुड़ी हुई है। इस मान्यता के अनुसार रुद्रप्रयाग के सिल्ला गांव स्थित साणेश्वर मंदिर से बातापी राक्षस भागकर बदरीनाथ धाम में शंख में छुप गया था, इसलिए धाम में शंखनाद नहीं होता है। 

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हिमालय - फोटो : अमर उजाला
जब हिमालय में था असुरों का आतंक

कहा जाता है कि जब हिमालय क्षेत्र में असुरों का आतंक था। तब, ऋषि-मुनि अपने आश्रमों में पूजा-अर्चना भी नहीं कर पाते थे। यही स्थिति साणेश्वर महाराज के मंदिर में भी थी। यहां जो भी ब्राह्मण पूजा-अर्चना को पहुंचते, राक्षस उन्हें अपना निवाला बना लेते।

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बदरीनाथ धाम - फोटो : file photo
राजा ने अगस्त्य मुनि से मांगी मदद

असुरों के आतंक से बचने के लिए साणेश्वर महाराज ने अपने भाई अगस्त्य ऋषि से मदद मांगी। एक दिन अगस्त्य ऋषि सिल्ला पहुंचे और साणेश्वर मंदिर में स्वयं पूजा-अर्चना करने लगे, लेकिन राक्षसों का उत्पात देखकर वह भी सहम गए।

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