देवभूमि उत्तराखंड में स्थित बदरीनाथ धाम के कपाट आज मंगलवार को ब्रह्ममुहूर्त में पुष्य नक्षत्र और वृष लग्न में 4 बजकर 15 मिनट पर खोल दिए गए। यह प्रसिद्ध मंदिर भगवान विष्णु जी को समर्पित है। इस मंदिर में जगत के पालनहारा भगवान विष्णु जी के रूप बदरीनारायण की पूजा होती है। कोरोना संक्रमण को देखते हुए पुजारियों सहित कुछ विशेष लोगों को मंदिर के अंदर जाने की अनुमति दी गई। मंदिर के कपाट खुलते ही जय बदरीनाथ के जयघोष से धाम गुंजायमान हो उठा।
Badrinath Temple: बदरीनाथ धाम में नहीं बजाया जाता है शंख, जानें क्या है इसके पीछे की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को शंख की ध्वनि प्रिय लगती है, लेकिन उनके धाम बदरीनाथ में शंख नहीं बजाया जाता है। सभी मंदिरों में शंख की ध्वनि से देवी देवताओं का आह्वान किया जाता है, लेकिन हिमालय की तलहटी पर विराजमान बदरीनाथ धाम में शंखनाद नहीं होता है।
धार्मिक कथाओं के अनुसार इसके पीछे एक प्राचीन मान्यता है जो रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के सिल्ला गांव से जुड़ी हुई है। इस मान्यता के अनुसार रुद्रप्रयाग के सिल्ला गांव स्थित साणेश्वर मंदिर से बातापी राक्षस भागकर बदरीनाथ धाम में शंख में छुप गया था, इसलिए धाम में शंखनाद नहीं होता है।
कहा जाता है कि जब हिमालय क्षेत्र में असुरों का आतंक था। तब, ऋषि-मुनि अपने आश्रमों में पूजा-अर्चना भी नहीं कर पाते थे। यही स्थिति साणेश्वर महाराज के मंदिर में भी थी। यहां जो भी ब्राह्मण पूजा-अर्चना को पहुंचते, राक्षस उन्हें अपना निवाला बना लेते।
असुरों के आतंक से बचने के लिए साणेश्वर महाराज ने अपने भाई अगस्त्य ऋषि से मदद मांगी। एक दिन अगस्त्य ऋषि सिल्ला पहुंचे और साणेश्वर मंदिर में स्वयं पूजा-अर्चना करने लगे, लेकिन राक्षसों का उत्पात देखकर वह भी सहम गए।