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Kotdwar News: विलुप्त होने के कगार पर पहुंची पहाड़ी भवन निर्माण शैली

Mon, 26 Aug 2024 10:35 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Mon, 26 Aug 2024 10:35 PM IST
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Hill building style on the verge of extinction

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सतपुली। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान रही परंपरागत भवन निर्माण शैली अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। पहाड़ी इलाकों में पठाल के ढालदार छतों वाले भवन और उन पर की गई लकड़ी और पत्थर की बेहतरीन नक्काशी प्राय : लुप्त हो गई है। हालांकि वातानुकूलित और भूकंप की दृष्टि से ईंट, सरिया, सीमेंट के भवनों के मुकाबले अधिक सुरक्षित होने के बावजूद आधुनिकता की चकाचौंध और निर्माण में समय की बचत के कारण पहाड़ अब कंकरीट के जंगलों में तब्दील होते जा रहे हैं।
नौनिहालों को तो यह तक पता नहीं कि जिस खोली के गणेश की वह दैणा होने की स्तुति कर रहे हैं, वह है क्या। नई पीढ़ी केवल गीतों और रील के माध्यम से ही खोली, तिबारी और डंडयाली के बारे में सुन सकेगी। उत्तराखंड के परंपरागत भवनों की दीवारों में उड़द की दाल, चूना, चिकनी लाल मिट्टी और पिरुल के मिश्रण से पत्थरों की चिनाई की जाती थी। वहीं छत पर ढालदार तरीके से पठालों को लकड़ी की मोटी कड़ियों के सहारे लगाया जाता था। वीरांगना तीलू रौतेली के एकेश्वर ब्लाॅक के ग्राम गुराड़ स्थित पैतृक घर समेत ऐसे कई भवन आज भी तीन चार सौ सालों से अनेक बड़े भूकंपों के बावजूद जस के तस खड़े हैं। इन भवनों में काष्ठकला और पत्थर की भी नायाब कारीगरी होती थी। घर के मुख्य द्वार जिसे खोली कहा जाता है, उसकी चौखट पर बारीक नक्काशी होती थी। उसके ऊपर बीचोंबीच भगवान गणेश की प्रतिमा उकेरी जाती थी। उसे ही खोली का गणेश कहते हैं। भवन के अग्रभाग में कमल के फूल की नक्काशी युक्त लकड़ी के खंभे होते थे, जिन्हें तिबारी कहा जाता है। भवन के प्रथम तल के अग्रभाग में लकड़ी की बालकनी होती थी, जिसे डंडय्ला कहा जाता है। नींव से लेकर छत तक आंतरिक जोड़ की तकनीक से भूकंप रोधी भवन तैयार किए जाते थे। मकान बनने में भले ही लंबा समय लगता था, लेकिन इनकी मजबूती वर्तमान में बनने वाले सीमेंट और ईंट से बनने वाले मकानों से कई गुना अधिक होती थी। खास बात यह कि यह भवन वातानुकूलित होने के साथ ही भूकंप की दृष्टि से भी अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हैं। नब्बे के दशक में उत्तरकाशी में भूकंप से हुई तबाही का जायजा लेने पहुंचे अमेरिकी वैज्ञानिक लॉरी बेकर और उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र (डीएमएमसी) भी अपने अध्ययन में इसकी पुष्टि कर चुके हैं। संवाद
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अधर में लटका शिल्प उन्नयन संस्थान

पर्वतीय क्षेत्र के परंपरागत शिल्प कला के उत्थान की योजना अधर में लटकी हुई है। हरीश रावत सरकार ने अल्मोड़ा जिले के धौला देवी विकासखंड के गुरुड़ा बांज में एक अरब रुपये की लागत के हरि प्रसाद टम्टा शिल्प उन्नयन संस्थान को स्वीकृति दी थी। इसके लिए सात करोड़ रुपये अवमुक्त भी किए गए थे। संस्थान में उत्तराखंड की परंपरागत शिल्पकला के उत्थान और सुदृढ़ीकरण के साथ ही प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित होना था। जिससे राज्य की लुप्त होती शिल्पकला को नई पीढ़ी के माध्यम से सुदृढ़ कर रोजगार के अवसर भी बढ़ाए जा सकें। संस्थान में पर्वतीय क्षेत्र की परंपरागत शैली के भवन निर्माण, ताम्र शिल्प, पीतल उद्योग, बांस और रिंगाल की वस्तुओं का निर्माण और प्रशिक्षणों के माध्यम से उत्पादों का निर्माण और विपणन की व्यवस्था करना था। प्रशिक्षण लेने वालों के लिए परिसर में हॉस्टल का निर्माण भी होना था। चयनित भूमि के समलीकरण, मुख्य सड़क से संस्थान तक सड़क निर्माण, चहारदीवारी, बिजली पानी की लाइन बिछाने, भवन की बुनियाद डालने आदि काम हुए, लेकिन प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होने के बाद काम आगे नहीं बढ़ सका।
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हैदराबाद में पिछले चार दशकों से रह रहे प्रवासी आर्किटेक्ट उदयपाल सिंह रावत ने अपने पैतृक गांव एकेश्वर ब्लॉक के ईड़ा में परंपरागत भवन निर्माण शैली में योग साधना केंद्र की स्थापना की है। उनका कहना है कि परंपरागत शैली के भवन निर्माण न होने से इस विधा के जानकार भी अब मिलने मुश्किल हो गए हैं। ऐसे में पारंपरिक शैली में भवन निर्माण करना और भी टेड़ी खीर साबित हो रहा है।
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