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नंदनगर के गांवों में फलेगी चिरायता की खेती

Sat, 24 Sep 2022 11:16 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sat, 24 Sep 2022 11:16 PM IST
सार

चमोली जनपद के नंदानगर विकास खंड के गांवों के काश्तकार अब परंपरागत खेती के साथ चिरायता की खेती भी करेंगे।औषधीय गुणों से भरपूर चिरायता की बाजार में हर साल मांग बढ़ रही है।चिरायता का आयात कम करने के लिए वृहद स्तर पर इसके व्यावसायिक कृषिकरण पर जोर दिया जा रहा है।

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The cultivation of absinthe will flourish in the villages of Nandanagar

विस्तार

चमोली जनपद के नंदानगर विकास खंड के गांवों के काश्तकार अब परंपरागत खेती के साथ चिरायता की खेती भी करेंगे। औषधीय गुणों से भरपूर चिरायता की बाजार में हर साल मांग बढ़ रही है। उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र गढ़वाल विवि श्रीनगर और झंडू फाउंडेशन की ओर से ग्रामीणों को चिरायता की पौध उपलब्ध कराने के साथ ही तकनीकी सहयोग भी दिया जा रहा है।
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चिरायता हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला औषधीय पौधा है। उत्तराखंड में यह समुद्र तल से 1200 से लेकर 3000 मीटर की ऊंचाई तक बसे गांवों में पाया जाता है। चमोली जनपद में जोशीमठ, दशोली, देवाल, थराली और नंदानगर क्षेत्र की भूमि जड़ी-बूटी के कृषिकरण के लिए सही है। चिरायता की डिमांड अधिक होने के कारण इसके कृषिकरण पर जोर दिया जा रहा है। गुजरात के झंडू फाउंडेशन और गढ़वाल विवि के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र की ओर से नंदानगर विकास खंड के खुनाणा, रामणी, पडेरगांव, घेस, पगना, भेंटी और बंगाली गांव के काश्तकारों को चिरायता के करीब तीन हजार पौधे वितरित किए गए। अब ग्रामीण इसके कृषिकरण में जुट गए हैं।
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पहले चरण में 69 काश्तकारों द्वारा चिरायता का कृषिकरण किया जा रहा है। काश्तकारों को उत्पादों के विपणन के लिए एक खाद्य प्रसंस्करण यूनिट भी स्थापित की जा रही है। इससे उन्हें उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। - डा. विनोद कुमार बिष्ट, वैज्ञानिक प्रभारी, झंडु फाउंडेशन।
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ग्रामीणों की ओर से परंपरागत खेती के साथ-साथ चिरायता का कृषिकरण भी किया जा रहा है। इसके विपणन से ग्रामीणों की आर्थिकी भी मजबूत होगी। - भगवान सिंह, सरपंच रामणी गांव।
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औषधीय गुणों से भरपूर चिरायता
गोपेश्वर। चिरायता का वैज्ञानिक नाम स्वैरसिया चिरायता है। औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में इसका अत्यधिक महत्व है। चिरायता का पौधा एक से 1.5 मीटर तक लंबा होता है। चिरायता में चिराटिन, स्वर्चिरिन जैसे अवयव होने के कारण यह औषधीय गुणों से भरपूर है। ज्वर नाशक व रक्तशोधक होने के साथ ही यह आंखों से संबंधित बीमारियों, मलेरिया, बुखार, शरीर की सूजन को कम करने, दमा, गठिया, मूत्र विकार और त्वचा रोगों में इसका उपयोग किया जाता है।

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खतरे की श्रेणी में है चिरायता
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड भारत सरकार के अनुसार भारत में इसकी वार्षिक खपत 404.70 टन है। यह भारत में नेपाल से आयात किया जाता है। प्राकृतिक रुप से भूमि का क्षरण, जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक विदोहन के कारण यह प्रजाति खतरे की श्रेणी में आ गई है। चिरायता का आयात कम करने के लिए वृहद स्तर पर इसके व्यावसायिक कृषिकरण पर जोर दिया जा रहा है।
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