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औली में बढते मानवीय हस्तक्षेप से पयावरणविद् चिंतित
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कर्णप्रयाग। चमोली जिले में स्थित पर्यटन स्थल औली में हाल के दिनों में हुई शाही शादी के बाद पर्यावरण प्रदूषण और मानवीय हस्तक्षेप से पर्यावरणविद् और भूगोलविद् चिंतित हैं। पर्यावरण प्रदूषण से औली की पारिस्थितीय संरचना गड़बड़ा सकती है। चारों तरफ फैली गंदगी और टेंट लगाने के लिए बनाए गए गड्ढों से भूमि अपरदन से खतरा बढ़ सकता है और औली में प्रयोग हुई पॉलीथिन खतरा साबित हो सकती है।
पिछले दिनों औली में हुई शाही शादी के बाद पर्यावरणविद् के अलावा जंतु वैज्ञानिक औली के इकोलॉजी सिस्टम पर अध्ययन करने में जुटे हैं। पीजी कॉलेज गोपेश्वर के भूगोल विभाग के पूर्व प्रोफेसर डा. जीत सिंह कंडारी का कहना है कि पर्यावरण प्रदूषण से औली और उससे ऊपर के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले वन्य जीव, प्राकृतिक वनस्पति के अलावा जड़ी-बूटी और दुर्लभ प्रजाति के फूलों को भारी नुकसान हो सकता है। वह कहते हैं कि पॉलीथिन पर जब बर्फ पड़ती है तो जमीन और बर्फ के बीच में एक परत जमा हो जाती है। जब पॉलीथिन पर बर्फ का दबाव बनता जाता है तो हिमखंड बनने के बाद उसके टूटने की संभावना अधिक हो जाती है। इससे हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले जीवों की खाद्य श्रृंखला डगमगा जाती है। एचएनबी गढ़वाल विवि के भूगोल विभाग के प्रोफेसर डा. एमएस पंवार और भूगोलवेता डा. राकेश गैरोला बताते हैं कि अनियोजित मानवीय हस्तक्षेप और प्रदूषण से औली की मृदा इकोलॉजी पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। प्रदूषण से वहां की मिट्टी की उत्पादक क्षमता में कमी के साथ-साथ जटामासी और अन्य जड़ी-बूटी को नुकसान हो सकता है।
कोट
हिमालयी क्षेत्रों में एक साथ भारी संख्या में मानवीय चहलकदमी घातक हो सकती है। औली भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील स्थानों की श्रेणी में आता है और हिमालयी क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप और धरती के बढ़ते तापमान से लगातार प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। - चंडी प्रसाद भट्ट, पर्यावरणविद्।
पिछले दिनों औली में हुई शाही शादी के बाद पर्यावरणविद् के अलावा जंतु वैज्ञानिक औली के इकोलॉजी सिस्टम पर अध्ययन करने में जुटे हैं। पीजी कॉलेज गोपेश्वर के भूगोल विभाग के पूर्व प्रोफेसर डा. जीत सिंह कंडारी का कहना है कि पर्यावरण प्रदूषण से औली और उससे ऊपर के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले वन्य जीव, प्राकृतिक वनस्पति के अलावा जड़ी-बूटी और दुर्लभ प्रजाति के फूलों को भारी नुकसान हो सकता है। वह कहते हैं कि पॉलीथिन पर जब बर्फ पड़ती है तो जमीन और बर्फ के बीच में एक परत जमा हो जाती है। जब पॉलीथिन पर बर्फ का दबाव बनता जाता है तो हिमखंड बनने के बाद उसके टूटने की संभावना अधिक हो जाती है। इससे हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले जीवों की खाद्य श्रृंखला डगमगा जाती है। एचएनबी गढ़वाल विवि के भूगोल विभाग के प्रोफेसर डा. एमएस पंवार और भूगोलवेता डा. राकेश गैरोला बताते हैं कि अनियोजित मानवीय हस्तक्षेप और प्रदूषण से औली की मृदा इकोलॉजी पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। प्रदूषण से वहां की मिट्टी की उत्पादक क्षमता में कमी के साथ-साथ जटामासी और अन्य जड़ी-बूटी को नुकसान हो सकता है।
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कोट
हिमालयी क्षेत्रों में एक साथ भारी संख्या में मानवीय चहलकदमी घातक हो सकती है। औली भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील स्थानों की श्रेणी में आता है और हिमालयी क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप और धरती के बढ़ते तापमान से लगातार प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। - चंडी प्रसाद भट्ट, पर्यावरणविद्।
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