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सावधानी बरतकर बचाएं पशुओं को खुरपका और मुंहपका से

Mon, 12 Aug 2019 02:08 AM IST
Gaurav sharma न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Gaurav sharma Updated Mon, 12 Aug 2019 02:08 AM IST
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Save animals with care by cracking and scratching
फाइल फोटो - फोटो : PTI
बरसात के मौसम में खुरपका और मुंहपका बीमारी पशुओं में तेजी से फैलती है। विषाणु जनित यह रोग आसानी से एक पशु से दूसरे में पहुंच जाता है। उपचार न मिलने पर पशु की मौत भी हो जाती है। जागरूकता और कुछ सावधानियां बरत कर किसान या पशुपालक अपने पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं।
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इस बीमारी को खरेडू, मुंहपका, खुरपका, चपका, खुरपा आदि नाम से भी जाना जाता हैं। यह संक्रामक बीमारी गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंट, सुअर आदि में होती है। विदेशी व संकर नस्ल की गायों में यह बीमारी गंभीर रूप धारण कर लेती है। दुधारू पशुओं में दूध कम हो जाता है। बैल काफी समय तक काम करने लायक नहीं रहते। इस बीमारी के विषाणु (वायरस) कई प्रकार के होते हैं। इनमें प्रमुख ओएसी एशिया-1, एशिया-2, एशिया-3, सैट-1, सैट-3 आदि में इनकी 14 उप किस्में शामिल हैं। हमारे देश में यह रोग मुख्यत: ओएसी और एशिया-1 प्रकार के विषाणुओं से होता है। वातावरण में नमी रहने पर विषाणु चार माह तक जीवित रह सकते हैं। गर्मी के मौसम में यह बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं। पशु के रक्त में पहुंचने के बाद ये विषाणु करीब पांच दिनों में बीमारी के लक्षण उत्पन्न करते हैं।
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बीमारी के लक्षण
-रोग के विषाणु बीमार पशु की लार, मुंह, खुर व थनों में पड़े फफोलों में पाए जाते हैं। रोग ग्रस्त पशु को 104 से 106 डिग्री तक बुखार हो जाता है। वह खाना-पीना बंद कर देता है। मुंह से लार बहने लगती है। पशु के मुंह के अंदर, खुरों के बीच और कभी-कभी थनों पर छाले पड़ जाते हैं। बाद में ये घाव का रूप ले लेते हैं। पशु कमजोर हो जाता है। खुरों में दर्द के कारण पशु लंगड़ा कर चलने लगता है। गर्भवती मादा में कई बार गर्भपात भी हो जाता है।
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उपचार
इस रोग का कोई निश्चित उपचार नहीं है। संक्रमण को रोकने के लिए उसे पशु चिकित्सक की सलाह पर एंटीबायोटिक टीके लगाए जाते हैं। मुंह व खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते हैं। मुंह में बोरो गिलिसरीन और खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है।

रोग से बचाव
वेटनरी कॉलेज के डॉ. सागर सारस्वत के अनुसार, इस बीमारी से बचाव के लिए पशुओं को पोलीवेलेंट वैक्सीन के वर्ष में दो बार टीके जरूर लगवाएं। बछड़े में पहला टीका एक माह की आयु में, दूसरा टीका तीसरे माह में और तीसरा टीका छह माह की उम्र में लगवाना चाहिए।

यह सावधानी बरतें
बीमार पशु को अन्य पशुओं से अलग रखें।
बीमार पशुओं के आवागमन पर रोक लगा देनी चाहिए।
रोग से प्रभावित क्षेत्र से पशु नहीं खरीदना चाहिए।
पशुशाला को साफ सुथरा रखना चाहिए।
मृत पशु को जमीन के नीचे चूना डालकर दबाना चाहिए।

जीवाणु जनित रोग
गलघोंटू रोग, लंगड़ा बुखार, बुसिल्लोसिस, बबेसिओसिस अथवा टिक फीवर, पशुओं के शरीर पर जुएं, चिचड़ी और पिस्सुओं का प्रकोप, पशुओं में अंत: परजीवी प्रकोप।

-जुलाई, अगस्त और सितंबर माह में मौसम में बदलाव रहता है। इन दिनों में पशुओं में यह बीमारी तेजी से बढ़ती है। पश्चिम में लगातार मुंहपका और खुरपका बीमारी से पशुओं की मौत हो रही है। पशुपालकों को जागरूक किया जा रहा है। -डॉ. आरती भटेले एचओडी, पैथोलॉजी, कृषि विवि

डाक्टर आरएस सेंगर, विभागाध्यक्ष बायोटेक कालेज, कृषि विवि मोदीपुरम
- अनार के फूल झड़ रहे है। रोकने का उपाय बताने का कष्ट करें। मुनेंद्र सिंह औरंगनगर किनारपुर मोदीनगर
-इसको रोकने के लिए पलानोफिक्स दवा का एक मिलीलीटर मात्रा को चार लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
- मैं एलोवेरा की खेती करना चाहता हूं। वीरेंद्र सिंह
- एलोवेरा की खेती के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए, जिसमें पानी न ठहरता हो। यह कम पानी चाहने वाली फसल है। पहले खेत तैयार कर लें। पुराने पौधों को निकालकर 45-45 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपाई करेंगे तो एलोवेरा का अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकेंगे।
- मैं पपीते की खेती करना चाहता हूं, कृपया पूर्ण जानकारी दें। फूलचंद धामपुर बिजनौर
- पपीते की खेती करने का यह सही समय चल रहा है। इस समय पपीते के बाग लगाए जा सकते हैं। इसकी खेती की पूर्ण जानकारी अमर उजाला के कृषि दर्शन कार्यक्रम के आगामी अंक में प्रकाशित की जायेगी।
-गोभी की खेती की जानकारी दे। बृजेश कुमार सहारनपुर
- फूल गोभी की खेती की नर्सरी जून से लेकर दिसंबर तक लगाई जा सकती है। इसकी कुछ हाइब्रिड प्रजातियां है। अगेती समर किंग पावस समर स्पेशल हाइब्रिड 212, विंटर किंग, एनएस 90, बसंती लेट मैन स्नोबॉल आदि प्रजातियां बाजार में उपलब्ध है।

- मेरी पुदीने की फसल में पत्तों को कीड़े खा रहे है। इसका इलाज कैसे होगा। आफताब, मुजफ्फरनगर
-अपनी पुदीने की खेती में मिथाइल पैर अखियां का दो किलोग्राम प्रति दर से छिड़काव करें। पुदीने की नर्सरी लगाने से पहले अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से संपर्क कर ले, जिससे वह खेत की विजिट करके रोग के लक्षणों को देखकर और अच्छा उपचार बता सकते है।
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