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सावन में पेड़ों से दूर हुए झूले, सावन के गीत भी  भूले बदलती जीवन शैली, मनोरंजन के बदलते माध्यम और महामारी का भी प्रभाव

Amarujala Local Bureau अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Wed, 28 Jul 2021 06:44 PM IST
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अलीगढ़। बदलती जीवन शैली, मनोरंजन के बदलते माध्यम और महामारी के चलते बदले हालात के कारण सावन के महीने में पेड़ों की डालों पर लगने वाले झूले और उनमें झूलती महिलाओं के दृश्य अब दिखाई नहीं देते हैं। 
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अगर कहीं झूला दिखाई देता भी है तो वह लोहे की एंगल और ग्रिल पर डाला जाता है। जिसमें क्लब के कुछ सदस्य प्रतीकात्मक रूप से आयोजन करते हैं। केवल झूले ही नहीं मौजूदा युवा पीढ़ी को सावन के लोकगीत भी याद नहीं है।
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कुछ वर्षों पहले तक शहर में लोकगीत की जानकार महिलाएं मौजूद थी जो ऐसे समय में आयोजन करके परंपरा का निर्वहन करती थीं लेकिन उनका स्वर्गवास हो जाने से अब यह भी चलन बंद सा हो गया है।
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पहले लोग सावन में खूब मस्ती करते थे। सब पड़ोसी साथ मिलकर झूला डालते थे और झूलते थे। साथ में स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद भी लेते थे। पर अब सब कुछ बदल गया है। सब अपने जीवन में व्यस्त हो गए हैं
- पूजा अरोड़ा, मैरिस रोड यह सही बात है कि अब सावन में पहले जैसे रंग दिखाई नहीं देते हैं। हम लोग प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। यह परंपराएं और लोकगीत व संस्कृति हमें हमारी सभ्यता के साथ जोड़े रखते थे। लेकिन अब यह चलन बदल रहा है। इसको सहेज कर रखने की आवश्यकता है - लता गुप्ता, आवास विकास कॉलोनी, जेल रोड जहां तक लोकगीतों का सवाल है अब वह सुनने को ही नहीं मिलते हैं। इसलिए युवा पीढ़ी के उनको याद करने की स्थिति ही नहीं होती है। पहले युवा अपने बुजुर्गों से लोकगीतों के विषय में सुनते रहते थे और जानते रहते थे। इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह गीत पहुंचते थे - नेहा अग्रवाल, निरंजनपुरी झूले ही नहीं अन्य प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक कार्यक्रमों को महामारी ने बहुत प्रभावित किया है। यह भी एक कारण है कि पिछले 2 वर्षों में सावन मास में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हो पाए हैं
- खुशबू स्वर्गीय पवित्रा सुहृद ने लोकगीतों पर किया था उल्लेखनीय कार्य अलीगढ़। बृज गीतों और लोकगीतों पर जेल रोड पर रहने वाली स्वर्गीय पवित्रा सुहृद ने बहुत काम किया था। ब्रज गीतों पर आधारित प्रदर्शनी में उनका कार्यक्रम भी होता था। सावन के महीने में लोक गीतों की प्रस्तुति में भी उनकी अहम भूमिका होती थी। लेकिन खुद उनके निधन के बाद यह कार्यक्रम बंद हो गए हैं।
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