Global Recession: महंगाई की मार और वैश्विक मंदी की आहट, रोजगार तो दूर आने वाले समय में छिन सकती हैं नौकरियां
महंगाई की मार झेल रही दुनिया को अब वैश्विक मंदी की आहट सता रही है। वर्तमान समय में दुनिया के कई देशों में महंगाई अपने उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है।
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Global Recession Forecast Explained: महंगाई की मार झेल रही दुनिया को अब वैश्विक मंदी की आहट सता रही है। वर्तमान समय में दुनिया के कई देशों में महंगाई अपने उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। महंगाई की दरें कई देशों में डबल डिजिट को क्रॉस कर रही हैं। इस कारण विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक एक्शन मोड में आ गए हैं और अपनी मौद्रिक नीतियों में बड़े बदलाव कर रहे हैं।
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक नियमित तौर पर ब्याज दरों में इजाफा कर रहे हैं। इस कारण स्टॉक मार्केट में भी लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। इन हालात को देखते हुए कई बड़े बैंक और संस्थाएं ये संकेत करने लगी हैं कि आने वाले वक्तों में दुनिया एक वैश्विक मंदी के दौर में प्रवेश कर सकती है।विज्ञापन
हाल ही में Goldman Sachs ने अपनी फॉरकास्ट में इस बात के संकेत दिए हैं कि आने वाले साल में दुनिया भर में मंदी आने की 30 प्रतिशत तक संभावना है। वहीं बैंक ऑफ अमेरिका की मानें तो साल 2023 में वैश्विक मंदी आने की 40 प्रतिशत तक संभावना है। इस कारण Global Recession को लेकर चर्चाएं काफी तेज हो गई हैं।
क्या होती है आर्थिक मंदी?
हर देश की अर्थव्यवस्था के साथ उतार-चढ़ाव का साइकल चलता रहता है। हालांकि, एक समय ऐसा आता है जब किसी देश की जीडीपी बढ़ने की जगह रुक जाती है या नकारात्मक होने लगती है। अगर ये जीडीपी दरें लगातार दो क्वार्टर या उससे ज्यादा समय तक नेगेटिव रहती हैं। ऐसे में इस दौर को आर्थिक मंदी कहा जाता है।
अमेरिका के National Bureau of Economic Research के मुताबिक जब किसी देश की अर्थव्यवस्था में पिछले 6 महीनों से लेकर 1 साल तक लगातार जीडीपी, आय, रोजगार और व्यापार में गिरावट देखने को मिलती है। उस दौर को आर्थिक मंदी के तौर पर जाना जाता है।
क्यों सता रही दुनिया को आर्थिक मंदी की आहट?
इस समय दुनिया भर में महंगाई की रफ्तार काफी तेजी से बढ़ रही है। इससे भारत भी अछूता नहीं है। बढ़ती मुद्रास्फीति के दौर में पेट्रोल, डीजल, सीएनजी, तेल और कई दूसरी जरूरी वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में इसका बुरा असर लोगों की जेबों पर पड़ रहा है। वहीं अमेरिका में महंगाई की दरों ने पिछले 40 सालों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। रिपोर्ट्स की मानें, तो अमेरिका में महंगाई की दरें 8.6 फीसदी क्रॉस कर चुकी हैं।
दुनिया भर में बढ़ रही इस महंगाई के पीछे दो प्रमुख वजह कोरोना महामारी और रूस यूक्रेन युद्ध हैं। दोनों प्रमुख घटनाओं की वजह से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) नकारात्मक तौर पर प्रभावित हुई है। कोरोना महामारी के बाद वैश्विक स्तर पर बाजारों में लिक्विडिटी बढ़ी थी।
इस कारण जब धीरे-धीरे जरूरी वस्तुओं को लेकर मांग बढ़ने लगी। उसी के समानांतर आपूर्ति श्रृंखला के बाधित होने की वजह से जरूरी वस्तुओं की सप्लाई काफी कम थी। ऐसे में वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगीं। वहीं बाद में रूस यूक्रेन युद्ध ने भी ग्लोबल सप्लाई चेन को बाधित कर दिया।
इस कारण बाधित हुई आपूर्ति श्रृंखला ने दुनिया भर में मुद्रास्फीति की रफ्तार को बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। इस कारण महंगाई को नियंत्रित करने के लिए दुनिया भर में केंद्रीय बैंक अपने देशों में ब्याज दरों को बढ़ा रहे हैं।
इसी को देखते हुए हाल ही में अमेरिका के सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व ने 0.75 फीसदी दरों में बढ़ोत्तरी की थी। वहीं भारत में भी रिजर्व बैंक ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए रेपो रेट में 0.50 फीसदी बढ़ोत्तरी की है।
ब्याज दरों के बढ़ाने की मुख्य वजह बाजार में लिक्विडिटी को कम करके मांग को कम करना है। मांग कम होने से चीजों के दाम धीरे-धीरे अपने आप कम होने लगेंगे। ऐसे में इंफ्लेशन अपने आप एक समय बाद नियंत्रित होने लगेगी।
दुनिया भर में केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार बढ़ाई जा रही इन दरों का नकारात्मक असर अर्थव्यवस्था के विकास पर पड़ सकता है। यही एक बड़ा कारण है, जिसके चलते दुनिया को वैश्विक मंदी की आहट सता रही है।
विश्व भर में केंद्रीय बैंकों के इस कदम से स्टॉक मार्केट निवेशक काफी चिंतित हैं। इसी वजह से अमेरिका के Standard and Poor 500 इंडेक्स में भी रिकॉर्ड गिरावट देखने को मिल रही है और वह बियर रन कर रहा है।
इसके अलावा हाउसिंग मार्केट में मोर्टगेज रेट भी काफी ज्यादा बढ़ गए हैं। ऐसे में रियल स्टेट से जुड़ी कई कंपनियां अपने कर्मचारियों की छटनी करना शुरू कर दी हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि मंदी की आहट का डर और बढ़ी हुई महंगाई के कारण हो सकता है लोग आने वाले समय में खर्चा करना काफी कम कर दें। इस कारण बाजार में लिक्विडिटी काफी कम हो जाएगी।
इससे महंगाई तो कम हो जाती है, लेकिन इसका सबसे बुरा असर अर्थव्यवस्था के विकास पर पड़ता है। वस्तुओं और सेवाओं की खरीदारी न होने से उत्पादन काफी कम हो जाता है। इस कारण देश की कंपनियों को एक बड़े नुकसान का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में बड़े पैमाने पर लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ सकता है। आज यह स्थिति दुनिया के कई देशों में देखने को मिल रही है। ऐसे में संभावना व्यक्त की जा रही है कि आने वाले समय में दुनिया एक वैश्विक मंदी के दौर में प्रवेश कर सकती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।