टोक्यो पैरालंपिक: 2013 में खेल छोड़ना चाहते थे 'गोल्डन ब्वॉय' झाझरिया, फिर पत्नी ने यूं बढ़ाया था हौसला
40 वर्षीय झाझरिया ने कहा कि जब भाला फेंक को 2008 और 2012 पैरालंपिक से बाहर कर दिया गया तो वह खेल छोड़ने के कगार पर थे लेकिन पत्नी के मान मनौव्वल के बाद उन्होंने इसे जारी रखा।
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दो बार के स्वर्ण पदक विजेता भारतीय भाला फेंक खिलाड़ी देवेंद्र झाझरिया ने मंगलवार को कहा कि वह साल 2013 में खेल छोड़ना चाहते थे लेकिन उनकी पत्नी ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। 40 वर्षीय इस 'गोल्डन ब्वॉय' ने कहा कि जब भाला फेंक को 2008 और 2012 पैरालंपिक से बाहर कर दिया गया तो वह खेल छोड़ने के कगार पर थे लेकिन पत्नी के मान मनौव्वल के बाद उन्होंने इसे जारी रखा। बता दें कि झझारिया की पत्नी मंजू पूर्व राष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी हैं।
झाझरिया ने मंगलवार को प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत में कहा, 'जब मेरे खेल को 2008 पैरालंपिक में नहीं शामिल किया गया तो मैंने कहा ठीक है 2016 में शामिल कर लिया जाएगा। मगर 2012 में जब इसे फिर नहीं शामिल किया गया तब मैनें साल 2013 में खेल छोड़ने का मन बना लिया था। मगर मेरी पत्नी ने मुझे ऐसा करने के लिए मना किया और आगे बढ़ते रहने के लिए प्रोत्साहित किया। इसलिए, मैंने अपना प्लान बदल दिया और 2013 में मुझे पता चला कि मेरा इवेंट रियो पैरालंपिक में होगा। फिर मैंने गांधीनगर में साई केंद्र में प्रशिक्षण शुरू किया और 2016 रियो में अपना दूसरा स्वर्ण जीता।'
झाझरिया पर टिकीं पूरे देश की निगाहें
झाझरिया पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। वह अपना तीसरा पैरालंपिक गोल्ड जीतने की कोशिश में होंगे। झाझरिया 2004 (एथेंस) और 2016 (रियो) में ऐसा कर चुके हैं। पीएम मोदी ने भी झाझरिया की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा, 'राजस्थान के पैरा एथलीट देवेंद्र झाझरिया जी का दमखम देखने लायक है। दो पैरालम्पिक में जैवलिन थ्रो में गोल्ड मेडल जीतने के बाद वे टोक्यो में भी स्वर्णिम सफलता हासिल करने के लिए तैयार हैं।' बातचीत के दौरान पीएम मोदी ने झझारिया से पूछा कि इतने बड़े अंतराल के बावजूद उम्र को झुकाते हुए पदक कैसे जीते। उन्होंने झझारिया की पत्नी और पूर्व कबड्डी खिलाड़ी मंजू से पूछा कि वह अब खेलती है या बंद कर दिया। वहीं बेटी जिया से कहा, टोक्यो खेलों के बाद आप पूरे परिवार के साथ स्टैच्यू ऑफ यूनिटी देखने जाना।'
उन्होंने कहा, 'जब मैं नौ साल का था, मेरा हाथ करंट लगने के कारण बुरी तरह से प्रभावित हो गया था। मेरे लिए घर से बाहर निकलना भी चुनौती थी। जब मैंने अपने स्कूल में भाला फेंकना शुरू किया तो मुझे लोगों के ताने झेलने पड़े। लोगों ने पूछा कि मैं भाला कैसे फेंकूंगा, वे मुझे कहते थे कि खेलों में मेरे लिए कोई जगह नहीं है, बेहतर है कि पढ़ाई करूं और अच्छी नौकरी हासिल करने की कोशिश करूं। फिर मैंने फैसला किया कि मैं कमजोर नहीं बनूंगा। जीवन में मैंने सीखा है कि जब हमारे सामने कोई चुनौती होती है तो आप सफलता प्राप्त करने के करीब होते हैं। इसलिए, मैंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया।'