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टोक्यो ओलंपिक्स: चीनी एथलीट की कामयाबी से मिली है ‘जीन थ्योरी’ को तगड़ी चुनौती!

Tue, 03 Aug 2021 03:37 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 03 Aug 2021 03:37 PM IST
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सार
खेल की दुनिया में इस मुद्दे पर गंभीर बहस रही है कि क्या आनुवंशिकी से किसी व्यक्ति की शारीरिक क्षमता तय होती है। एक दलील है कि कुछ जीन शरीर में ऐसे प्रोटीन फाइबर का उत्पादन करने में ज्यादा सक्षम हैं, जिनसे मांसपेशियों में बल आता है...
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Tokyo olympics 2021: The success of the Chinese athlete su bingtian in 100 meter race has given a big challenge to Gene Theory
सु बिंगतियान - फोटो : Agency

विस्तार

टोक्यो ओलंपिक में रविवार को पुरुषों की 100 मीटर दौड़ के फाइनल में चीन के सु बिंगतियान ने भी जगह बनाई थी। 32 साल के इस धावक ने 9.83 सेकंड में ये दौड़ पूरी कर ली। 1932 के बाद ये पहला मौका था, जब किसी एशियाई धावक ने 100 मीटर दौड़ के फाइनल में जगह बनाई। इस दौड़ में वर्ल्ड रिकॉर्ड अभी भी जमैका के उसैन बोल्ट के नाम है, जिन्होंने 2009 में ये दूरी 9.58 सेकंड में पूरी की थी। लेकिन अब सु इस दूरी को सबसे कम समय में तय करने वाले इतिहास के 12वें व्यक्ति बन गए हैं।



इससे ये बहस खड़ी हो गई है कि 100 मीटर की दौड़ को लेकर प्रचलित जीन थ्योरी (आनुवंशिकी सिद्धांत) का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इस सिद्धांत के तहत दावा किया जाता रहा है कि सबसे तेज दौड़ने में सक्षम एक खास आनुवंशिकी वाले लोग हैं, जिनके पूर्वज अफ्रीका में रहते थे। उसी आनुवंशिकी के लोग वेस्ट इंडीज (जहां जमैका है) और अमेरिका में लाकर बसाए गए।


चीन की सिनघुआ यूनिवर्सिटी में 2014 में हुए एक शोध में कहा गया था कि ऐसी दौड़ के लिए टेक्नोलॉजी और वैज्ञानिक प्रशिक्षण से दूसरे जीन वाले लोगों को मदद मिल सकती है। लेकिन ये मदद एक सीमा से आगे नहीं जा सकती। ये अनुसंधान प्रोफेसर ली चिंग के नेतृत्व में हुआ था। यह चाइना स्पोर्ट्स साइंस जर्नल में छपा था। तब से दुनिया में उसका हवाला दिया जाता रहा है।

खेल की दुनिया में इस मुद्दे पर गंभीर बहस रही है कि क्या आनुवंशिकी से किसी व्यक्ति की शारीरिक क्षमता तय होती है। एक दलील है कि कुछ जीन शरीर में ऐसे प्रोटीन फाइबर का उत्पादन करने में ज्यादा सक्षम हैं, जिनसे मांसपेशियों में बल आता है। साथ ही उससे कोशिकाएं ऑक्सीजन की कमी की स्थिति में अधिक सक्रिय हो जाती हैं। इस प्रक्रिया को बर्स्ट प्रोटीन का निर्माण करते हैं। अफ्रीकी एथलीटों के शरीर में ये प्रक्रिया होती देखी गई है।

सिनघुआ यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक चीन के लोगों के शरीर में ऐसा जीन है, जो बर्स्ट प्रोटीन का निर्माण रोक देता है। ऐसे जीन के कारण मानव शरीर में अंग छोटे होते हैं, नितंब अधिक चौड़े होते हैं, सेक्स हारमोन की मात्रा निम्न बनी रहती है, और शुगर मेटाबोलिज्म धीमी गति से होता है। इस कारण एशियाई एथलीट नुकसान की अवस्था में रहते हैं।

लेकिन अब कई जानकारों का कहना है कि सु बिंगतियान ने जिस तरह अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में प्रगति की है, उससे इस सिद्धांत को कड़ी चुनौती मिलती है। 2018 में शंघाई में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में सु ने सबको हैरत में डालते हुए रजत पदक जीत लिया था। बल्कि तब दौड़ के बाद हुए विश्लेषण से सामने आया था कि अगर उन्होंने आखिरी दस मीटर में एक तकनीकी गलती ना की होती, तो वे स्वर्ण पदक भी जीत सकते थे।

चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स साइंस से जुड़े विशेषज्ञ युवान तिंगगांग और उनके सहयोगियों ने 2019 में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में कहा था कि ‘सु बिंगतियान की प्रगति और सफलताओं ने काल्पनिक सीमा को तोड़ दिया है।’ उसके अलावा भी कई विशेषज्ञ चीन थ्योरी की आलोचना करते रहे हैं। इस सिलसिले में ये ध्यान दिलाया गया है कि कई पश्चिमी अफ्रीकी एथलीटों का प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं रहा है, जबकि उनमें भी वहां के लोगों में पाया जाने वाला जीन ही है। अब सु बिंगतियान की सफलता ने इस सिद्धांत को और भी तगड़ी चुनौती दे दी है।

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