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'हमारा कल्चर ही मेडल जीतने वाला नहीं है'

Tue, 16 Aug 2016 03:18 AM IST
आकार पटेल, बीबीसी
आकार पटेल, बीबीसी Updated Tue, 16 Aug 2016 03:18 AM IST
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our culture in not worth winning a medal
- फोटो : reuters
रियो ओलंपिक में भारतीय एथलीटों के खराब प्रदर्शन की खबरें पढ़कर कोई सोच सकता है और अचरज में पड़ सकता है कि खेलों में ये इतने फिसड्डी हैं... बीते कई महीनों से मीडिया ये बताता रहा कि रियो ओलंपिक में हिस्सा लेने वाला भारतीय दल किसी भी दक्षिण एशियाई देश के मुकाबले में सबसे बड़ा है। इससे इस बात की संभावना बढ़ी थी कि भारतीय खिलाड़ी इस बार बेहतर प्रदर्शन करेंगे। जब डोपिंग के आरोपों के बाद एक कुश्ती खिलाड़ी के निलंबन को वापस लिया गया तो वह दिन की मुख्य खबर थी। मैं ये इसलिए जानता हूं क्योंकि मैं उस दिन कुछ टीवी चैनलों पर रात के समय गेस्ट के तौर पर आमंत्रित था, लेकिन वे शो रद्द हो गए, क्योंकि टीवी चैनल इस खबर को फॉलो करना चाहते थे।
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ऐसे में सवाल यही है कि क्या भारत ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है? जवाब है, हमेशा की तरह इस बार भी नहीं कर रहा है। दरअसल इसकी दो बड़ी वजहें हैं। इसमें एक तो सर्वमान्य वजह है, जिसका बाहरी दुनिया से लेना-देना है। मेरा मतलब सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाएं और पोषण का उपयुक्त स्तर है। जब आबादी स्वस्थ होगी और देश में बेहतर कोचिंग और ट्रेनिंग की व्यवस्था होगी, तब खिलाड़ी भी पदक जीतना शुरू कर देंगे।
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इससे संबंधित कुछ क्षेत्रों में चीज़ें बेहतर हो रही हैं। उदाहरण के लिए, सुविधाएं और कोचिंग का स्तर बेहतर हुआ है, भले ज्यादातर चीजें केवल क्रिकेट के लिए हुई हों, और वो भी विदेशी कोचों की मदद से। भारत में पश्चिमी देशों जैसी सुविधाएं नहीं हैं, लेकिन चीजें बेहतर हो रही हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। भारत के अधिकतर लोग गरीब हैं। उन्हें उपयुक्त पोषण नहीं मिलता। देश के बहुत बड़े मध्य वर्ग को हर तरह का पोषण मिलता है।
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हमें शारीरिक श्रम आकर्षित नहीं करता, यह निचले तबके का सूचक है

our culture in not worth winning a medal
हम ये भी कहते रहते हैं कि मध्य वर्ग की आबादी बढ़ रही है और इसकी संख्या कई देशों की आबादी से भी ज्यादा है। इसके अलावा हर बार मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए सरकार नकद इनाम और नौकरियों की घोषणा भी करती है। तो एक स्तर के बाद इस बात का बहाना नहीं बनाया जा सकता है। हकीकत ये है कि एथलेटिक्स और दूसरे खेलों को क्रिकेट की तुलना में मीडिया से मदद नहीं मिलती। लेकिन ये किसी भी देश की हकीकत हो सकती है।

हो सकता है कि ओलंपिक इतिहास के सबसे कामयाब एथलीट माइकल फेल्प्स को न्यूयॉर्क की गलियों में लोग पहचान नहीं पाएं और बेसबॉल और बास्केटबॉल के सितारों के इर्द-गिर्द भीड़ जुट जाए। इसलिए जो चीजें दुनिया भर में हो सकती हैं, वही भारत में भी मौजूद हैं। अब मैं आपको दूसरी और अहम वजह के बारे में बताता हूं। यह दुनिया और शारीरिक काम को देखने का खास नजरिया है। इसे समझने के लिए एक राजनीतिक उदाहरण देखते हैं।

अमरीका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन अपने जीवन की तमाम सुबह घर से बाहर निकलते थे और हवा का दबाव अपने बैरोमीटर से नापते थे। अमरीका के 43वें राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश अपने फॉर्म हाउस में खुद से काम करते थे। भारत में नेता ऐसा कुछ करते होंगे, क्या आप इसकी कल्पना भी कर सकते हैं? नहीं, क्योंकि हममें से भी तो कुछ ही लोग ऐसा करते हैं। यह केवल आर्थिक कारणों से नहीं होता, हमारे यहां नौकरों की संस्कृति है। हमें शारीरिक श्रम आकर्षित नहीं करता। ऐसा करना सामाजिक तौर पर निचले तबके से होने का सूचक है। अगर बाग की देखभाल करने वाला या फिर गाड़ी साफ करने वाला कोई मिल जाए, तो हम ये काम खुद से नहीं करते। काम करने से मिलने वाले आनंद का तो सवाल ही नहीं उठता...

हम सिर्फ चर्चा कर सकते हैं

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ऐसी संस्कृति में जहां हम शारीरिक श्रम नहीं करते हों, वहां सुविधाएं चाहे जितनी बेहतर हो जाएं, विश्वस्तरीय एथलीट नहीं निकल सकते। अहम बात ये है कि हम शारीरिक श्रम में आनंद नहीं महसूस करते। ज्यादातर भारतीय शारीरिक श्रम जिम में करते हैं। अगर घर पर भी कोई सोफा हटाना या दूसरी जगह ले जाना हो तो वो काम कोई दूसरा आदमी करेगा। मैं ऐसे कुछ अमरीकी और यूरोपीय करोड़पतियों को जानता हूं जो अपना काम किसी दूसरे से करने को नहीं कहते। वे ये भी नहीं चाहते कि कोई दूसरा शख्स उनकी निजी जिंदगी में दखल दे। वो रोजमर्रा का अपना काम खुद करते हैं।

हम ऐसे नहीं हैं और ये नजर आने वाला तथ्य है। ऐसी संस्कृति वाली जगह में कोई युवा पूरी एकाग्रता से अपनी शारीरिक क्षमता को बेहतर बना पाएगा, ये संभव नहीं लगता है। साफ है कि ओलंपिक में भारतीय खिलाडी पदक नहीं जीत पा रहे हैं, तो इसकी कोई बाहरी वजह नहीं है। यह हमारी संस्कृति है। ऐसी ही संस्कृति वाले पडोसी देश बांग्लादेश और पाकिस्तान को मिला लें तो हमारी आबादी 1.6 अरब है, दुनिया की आबादी का करीब एक चौथाई। लेकिन ओलंपिक में हम नगण्य हैं।

हमारी स्थिति ऐसी ही रहेगी, हमारी एथलीटों की संख्या को देखकर हमें एकाध पदक भी मिल जाए तो भी लंबे समय तक हालात यही रहेंगे। हम इस पर अचरज कर सकते हैं कि हमारे साथ क्या गलत हो रहा है और नौकर की बनाई गई चाय पीते हुए हम इस पर चर्चा भी कर सकते हैं।
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