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महिला दिवसः कभी धोती थी ढाबे पर बर्तन, अभावों में बीता बचपन, फिर यूं बदली कविता की जिंदगी

Thu, 07 Mar 2019 11:23 PM IST
Mukesh Jha स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Published by: Mukesh Jha Updated Thu, 07 Mar 2019 11:23 PM IST
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International Women's Day: kavita thakur and hima das untold life story
kavita thakur

भारतीय महिला कबड्डी टीम की डिफेंडर कविता ठाकुर ने तमाम विषम परिस्थितियों से पार पाकर अपनी अलग पहचान बनाई। हिमाचल प्रदेश के मनाली के जगतसुख गांव की 25 वर्षीय इस खिलाड़ी ने देश को 2014 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 

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कविता का बचपन अभावों में बीता। उनके माता-पिता ढ़ाबे पर चाय और स्नैक्स बेचते हैं। कविता बचपन में अपने ढाबे पर बर्तन धोने और साफ-सफाई के अलावा और भी कई काम करती थी। परिवार रात को ढाबे के पीछे ही फर्श पर सोता था। 
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सर्दियों में फर्श बिल्कुल बर्फ की तरह ठंडा हो जाता था। उनके पास गद्दा तक खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। यहां तक कि कई बार उन्हें भूखा भी रहना पड़ता। कविता ने अपने खेल से न सिर्फ अपनी जिंदगी संवारी बल्कि अपने माता-पिता और भाई बहनों को भी नई जिंदगी दी। 
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-2014 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक और 2018 में रजत जीतने वाली महिला कबड्डी टीम की सदस्य
-2012 एशियन चैंपियनशिप में पीला तमगा जीतने वाली भारतीय टीम की सदस्य 

बंडर गर्ल हिमा

असम के छोटे से गांव धिंग के किसान रोंजित दास की सबसे छोटी बिटिया हिमा दास ने छोटी सी उम्र में ही अपनी अलग पहचान बना ली है। कभी फुटबॉल खेलने वाली 19 वर्षीय हिमा अब भारतीय एथलेटिक्स का चमकता सितारा बन गई हैं।

हिमा ने18 साल की उम्र में आइएएएफ अंडर-20  एथेलिटक्स चैंपियनशिप में महिलाओ की 400 मीटर दौड़ में विश्व चैंपियन बनकर इतिहास बना दिया। वह एथलेटिक्स विश्व चैंपियनशिप में किसी भी वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला एथलीट हैं।

धिंग एक्सप्रेस के नाम से मशहूर हिमा के नाम ही 400 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी है। उन्होंने जकार्ता एशियाई खेलों में 50.79 सेकंड के समय के साथ यह रिकॉर्ड बनाया।

- 03 पदक (महिलाओं की 4 गुणा 400 मी स्वर्ण, मिश्रित टीम स्पर्धा में रजत और 400 मी व्यक्तिगत रजत) एशियाई खेलों में जीते 
-एकमात्र भारतीय महिला एथलीट है विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली। वह 2018 में अंडर-20 वर्ग में चैंपियन बनीं थीं  

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