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हॉकी को बहुत कुछ दिया, लेकिन इस वजह से अपने आखिरी के दिनों में खुश नहीं थे मेजर ध्यानचंद
ब्यूरो/अमर उजाला, झांसी
Updated Sat, 23 Sep 2017 07:22 PM IST
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मेजर ध्यानचंद
वर्ष 1956 में राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद से देश के तीसरे सबसे बडे़ नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित हुए ध्यानचंद जीवन के आखिरी दिनों में आर्थिक तंगी के चलते बहुत दुखी थे। उनका मानना था कि हॉकी खेल में उन्होंने बहुत कुछ दिया, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। इसके चलते वह परिवार के सदस्यों को हाकी खेलने नहीं देते थे। अशोक ध्यानचंद के मुताबिक वह खेलने के लिए घर में पीछे के दरवाजे से जाते थे।
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29 अगस्त 1905 में इलाहाबाद में जन्मे मेजर ध्यानचंद ने बचपन में ही हॉकी थाम ली थी। जल्द ही हाकी में विशेषज्ञता हासिल करने पर उन्हें पंजाब रेजीमेंट में जगह मिली। यहां उनके खेल में निखार आया और वह न्यूजीलैंड जाने वाली आर्मी हाकी टीम का हिस्सा बने। न्यूजीलैंड में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद 1928 में उन्हें एस्टरडम ओलंपिक के लिए चुना गया, जिसके बाद वह भारतीय टीम के प्रमुख सदस्य बन गए।
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1936 में बर्लिन ओलंपिक में भारतीय टीम का नेतृत्व किया और तीनों ओलंपिक मुकाबलों में भारत ने स्वर्ण पदक जीता। उनके खेल कौशल का हिटलर मुरीद था। समूची दुनिया उनकी हाकी खेल तकनीक की कायल थी।
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यही कारण है कि आस्ट्रिया के शहर विएना में मेजर ध्यानचंद की चार हाथ वाली मूर्ति लगी है। वही भारतीय डाक विभाग ने उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया। इसके अलावा दिल्ली, झांसी में उनके नाम पर स्टेडियम बना। अशोक ध्यानचंद के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय कैरियर में दद्दा के 400 से अधिक गोल है।
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