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भारत कब खेल पाएगा फीफा विश्व कप? क्रिकेट के बादशाह को कब मिलेंगे अपने मेसी- रोनाल्डो?

Sun, 24 Jun 2018 09:51 AM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली Updated Sun, 24 Jun 2018 09:51 AM IST
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Can India play football World Cup?

दुनिया की आबादी साढ़े 7.6 अरब से कुछ ज्यादा है। 2018 फुटबॉल विश्वकप में कुल 736 खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं और इनमें भारतीय खिलाड़ियों की संख्या शून्य है। भारत के फुटबॉल विश्व कप में न पहुंच पाने पर बहस होती रही है, लेकिन ऐसी क्या वजह है कि भारत वर्ल्ड कप लायक खिलाड़ी तैयार ही नहीं कर पाता? 

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विश्व स्तरीय खिलाड़ी कैसे पैदा किए जाते हैं और क्या भारत कभी ऐसा कर सकेगा?

पेशेवर फ़ुटबॉल खिलाड़ी बनने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत होती है। शारीरिक और मानसिक मेहनत के अलावा रणनीतिक कुशलता भी जरूरी है। सर्वश्रेष्ठ कोचिंग, विश्वस्तरीय सुविधाएं और हजारों घंटे पसीना बहाने के बाद कोई पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी बन पाता है।
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फीफा के पूर्व अध्यक्ष सेप ब्लेटर ने एक समय कहा था कि भारत फुटबॉल जगत का सोता हुआ शेर है। बीते चार सालों में भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम की रैकिंग में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। साल 2014 में भारतीय टीम दुनिया में 170वें नंबर पर थी जो अब 97वें नंबर पर है। इंडियन सुपर लीग (आईएसएल), आई-लीग और यूथ लीग भारत में फुटबॉल के प्रचार में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं।
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लेकिन क्या ये काफी हैं? भारत को विश्व कप में अपनी टीम को देखने के लिए कितना और इंतजार करना होगा?

जानिए फुटबॉल जगत के विशेषज्ञों ने क्या कहा?

Can India play football World Cup?

फुटबॉल में खिलाड़ी को बेहद तेज गति से छोटे-छोटे मूवमेंट करने होते हैं। इसके लिए हर खिलाड़ी को शारीरिक मजबूती, स्टेमिना, ताकतवर टांगे, फुटवर्क, जल्दी से दिशा बदलने की क्षमता, गति, तेजी से दौड़ना और रुकना, शारीरिक संतुलन आदि की जरूरत होती है। फुटबॉल के मैदान में कामयाबी के लिए ये शारीरिक क्षमताएं जरूरी हैं।

दौड़ना फुटबॉल का सबसे अहम हिस्सा है और कुछ खिलाड़ी तो मैच खत्म होने तक 14.5 किलोमीटर तक दौड़ लेते हैं और कई बार मैदान पर 35 किलोमीटर प्रतिघंटा तक की रफ्तार पकड़ लेते हैं। बाकी खेलों के मुकाबले फुटबॉल में दौड़ने की जरूरत ज्यादा होती है।

अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ काम करने वाले डॉ. विजय सुब्रमण्यम कहते हैं, 'फुटबॉल में आपको कुछ विशेष शारीरिक क्षमताओं की जरूरत होती है। मजबूत पीठ, पेट और ग्रोइन महत्वपूर्ण है। गेंद को तेजी से मारने के लिए मांसपेशियों का मजबूत होना अहम है'।

वो कहते हैं, 'खिलाड़ियों के लिए कोई तय ऊंचाई नहीं है। अगर किसी खिलाड़ी का कद छोटा है तो वह गेंद के साथ ड्रिबल अच्छे से कर सकता है। लंबे खिलाड़ी अच्छा दौड़ सकते हैं और हवाई गोल दाग सकते हैं'।

अर्जेंटीना और बार्सीलोना के स्टार खिलाड़ी मेसी छोटे कद के शानदार ड्रिबलर का अच्छा उदाहरण हैं। विजय कहते हैं, मेसी की तरह ही दक्षिण अमरीकी देशों के कई खिलाड़ी छोटे हैं और सेंटर ऑफ ग्रेविटी के कम होने से उन्हें गेंद को ड्रिबल करने में मदद मिलती है।

विजय कहते हैं, 'शारीरिक फिटनेस के मामले में पिछले कुछ सालों में भारतीय खिलाड़ियों में सुधार हुआ है। ऐसा सिर्फ फुटबॉल में ही नहीं बल्कि बाकी खेलों में भी हुआ है'।

'क्रिस्टियानो रोनाल्डो दुनिया के सबसे फिट खिलाड़ियों में शामिल हैं। वो ऐसे कूदते और छलांग लगाते हैं कि रक्षक दल के लिए मुश्किल हो जाती है। मैदान में वह एक मजबूत खिलाड़ी हैं जिनका सामना करना मुश्किल होता है।'

क्या लंबाई और मांशपेशियों की ताकत अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में निर्णायक भूमिका निभाते हैं? भारतीय फुटबॉल फेडेरेशन के कार्यकारी टेक्निकल डायरेक्टर सेवियो कहते हैं, 'रक्षक दल के खिलाड़ी के लिए अच्छी लंबाई मददगार होती है, लेकिन असल में खिलाड़ी की लंबाई या माशपेशियों की ताकत के बजाए शारीरिक ताकत और रणनीतिक कुशलता ज्यादा अहम होती है।'

मनोवैज्ञानिक ताकत

Can India play football World Cup?

सावियो कहते हैं, 'आमतौर पर लोगों को लगता है कि भारतीय खिलाड़ियों और पश्चिमी देशों के खिलाड़ियों में मूल फर्क शारीरिक शक्ति का है, लेकिन मुझे लगता है कि भारतीय खिलाड़ी तकनीकी दक्षता और रणनीतिक कुशलता में ज्यादा पिछड़ते हैं।'

राष्ट्रीय स्तर के फ़ुटबॉल खिलाड़ी रह चुके वीवा फ़टबॉल पत्रिका के एक्जीक्यूटिव एडिटर आशीष पेंडसे कहते हैं, 'फुटबॉल सिर्फ मैदान में ही नहीं बल्कि दिमाग में भी खेली जाती है। किसी भी खिलाड़ी के लिए मजबूत जेनेटिक्स बहुत जरूरी है। इस क्षेत्र में भारतीय खिलाड़ी यूरोपीय खिलाड़ियों से पिछड़ते नजर आते हैं, लेकिन रणनीतिक कुशलता में सुधार करके इससे उबरा जा सकता है। नए दौर के पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ियों में टीम की रणनीति बनाने की प्राकृतिक क्षमता होनी चाहिए। इसके अलावा जगह बनाना, हमले का जवाब देना और कई अन्य रणनीतिक कुशलताओं की भी जरूरत होती है।'

खेल पत्रकार और फुटबॉल विशेषज्ञ नोवी कपाड़िया कहते हैं, 'भारत में कई परिजनों को लगता है कि पेशेवर खिलाड़ी बनने के लिए बच्चों की पांच या छह सात साल की उम्र से कोचिंग शुरू हो जानी चाहिए, लेकिन ये सिर्फ एक धारणा ही है जिससे वास्तव में कोई नतीजे नहीं निकल सकते।'

कपाड़िया का कहना है कि बच्चों को 12-13 साल की उम्र तक मैदान में खेलने भेजना चाहिए। उस समय उनकी योग्यता आसानी से परखी जा सकती है और खेल को लेकर उनके जुनून को देखते हुए सही फैसला लिया जा सकता है। लेकिन सेवियो की राय अलग है। वो कहते हैं, 'अन्य यूरोपीय और एशियाई देशों के खिलाड़ियों का मुकाबला करने के लिए कम उम्र से शुरुआत करनी होगी। इससे बच्चों को निर्णय लेने की क्षमता और रणनीतिक समझ विकसित करने में मदद मिलेगी।'

इंफ्रास्ट्रक्चर और कोचिंग

Can India play football World Cup?

पेंडसे के मुताबिक फ़ुटबॉल की अहम बातें जैसे की गेंद पर नियंत्रण, ड्रिबलिंग, गेंद के साथ दौड़ना और अन्य रणनीतियां एक अच्छा कोच ही सिखा सकता है। दुर्भाग्यवश भारत इस मामले में पिछड़ा हुआ है और उसे बेहतर कोचों की बहुत ज्यादा जरूरत है।

पेंडसे कहते हैं, 'हाल ही में भारत में यूथ कप हुआ था जिसमें कई देशों ने हिस्सा लिया था। अमरीकी टीम के साथ तकनीकी दल के सात लोग थे जो खेल से जुड़ी गणनाएं टीम के लिए कर रहे थे, लेकिन भारतीय टीम के साथ कोई वीडियो या डाटा एनेलिस्ट नहीं था। ये सामान्य और मूल चीजें हैं जो अन्य देशों में उपलब्ध हैं लेकिन भारत के पास नहीं हैं।'

भारत में खिलाड़ियों के लिए बेहतर मैदान और प्रतियोगिताएं खोजना भी चुनौतीपूर्ण होता है।

कपाड़िया कहते हैं, 'भारत में फुटबॉल में कोई प्रतियोगिता ही नहीं है। अंडर 17 में पूर्वोत्तर राज्यों से 8 खिलाड़ी होते हैं और बाकी दो-तीन खिलाड़ी अन्य प्रांतों से होते हैं। तो हम कैसे कह सकते हैं कि पूरा भारत फुटबॉल खेल रहा है? 60-70 के दशक में कई फुटबॉल स्टेडियम थे जो धीरे-धीरे क्रिकेट स्टेडियमों में बदल गए हैं।'

फुटबॉल की दुनिया में अच्छे कोच बदलाव ला रहे हैं। सावियो कहते हैं, 'भारत की घरेलू टीमों को अच्छे कोचों की जरूरत है क्योंकि सिर्फ अच्छे कोच ही अच्छे खिलाड़ी पैदा कर सकते हैं।'

क्या भारत को मिलेगा रोनाल्डो-मेसी?

Can India play football World Cup?

कई खिलाड़ी और कोच दस हजार घंटों के अभ्यास की थ्योरी में यकीन रखते हैं। माना जाता है कि दस हजार घंटों के अभ्यास से बेहतर फुटबॉलर बना जा सकता है, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये सिद्धांत सभी खिलाड़ियों पर लागू नहीं होता और हर किसी खिलाड़ी के लिए ये अलग-अलग है।

बेकहम और रोनाल्डो जैसे खिलाड़ियों ने अभ्यास में खूब पसीना बहाया है। फ्री किक और गेंद पर प्रहार जैसी दक्षता हासिल करने के लिए वो घंटों अभ्यास करते रहे हैं।

क्या भारत को मिलेगा रोनाल्डो-मेसी?

भले ही भारतीय टीम देरी से ही सही कुछ कामयाबियां हासिल कर रही है लेकिन ये सवाल अभी भी बरकरार है कि क्या भारत मेसी या रोनाल्डो जैसा टेलेंट पैदा कर सकता है? सावियो कहते हैं, 'अगर भारत में फुटबॉल संस्कृति विकसित होती है तो एक स्टार खिलाड़ी भी अपने आप ही पैदा हो जाएगा। तब इस सवाल की शायद जरूरत ही नहीं होगी।'

प्रकाश कहते हैं, 'मेसी रोनाल्डो सिर्फ एक नाम ही तो है। भारत ने भी बाइचुंग भूटिया, आईएम विजयन, पीटर थंगराज जैसे महान खिलाड़ी दिए हैं। सुनील छेत्री को भी याद रखिए। मेसी और रोनाल्डो अपने क्लब की स्टार पॉवर और अपने देशों में फुटबॉल के प्रति दीवानगी की वजह से इतने चर्चित नाम हैं।'

पेंडसे कहते हैं, 'नेमार, मेसी, माराडोना जैसे खिलाड़ी निश्चित तौर पर खेल को नई ऊंचाइयों तक लेकर गए हैं। वो युवाओं में जुनून पैदा करते हैं, लेकिन सुनील छेत्री, बाइचुंग भूटिया और आईएम विजयन जैसे खिलाड़ी भी अपनी तरह के हीरो हैं।'

क्या भारत में ट्रेंड बदल रहा है?

Can India play football World Cup?

सावियो कहते हैं, 'आईएसएल ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि भारत में सिर्फ क्रिकेट ही नहीं बल्कि फुटबॉल भी खेला जा रहा है। भारतीय क्लबों को अपनी यूथ टीमें विकसित करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है।'

पेंडसे कहते हैं कि धीरे-धीरे ही सही भारत में फुटबॉल को लेकर हालात बेहतर हो रहे हैं। वो कहते हैं, '1990 के दशक में हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था, लेकिन अब सीनियर लेवल पर पहुंचने के लिए यूथ टीम में खेलना जरूरी हो गया है। आज भारत में तीस प्रमुख अकादमी हैं और इतनी ही सीनियर टीमें भी हैं जिनसे 1500-2000 फुटबॉलर पैदा हो रहे हैं।'

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