सिंधू की मम्मी ने मना किया था बिरयानी और आइसक्रीम खाने से
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पीवी सिंधू देश की नई खेल सनसनी बन गई हैं, लेकिन उनका ओलंपिक के रजत पदक तक का सफर आसान नहीं रहा है। इसके लिए उन्हें अनुशासन और कड़ी मेहनत के साथ अपने खान-पान पर भी काफी नियंत्रण रखना पड़ा है।
कोच गोपीचंद के कड़े अनुशासन ने सिंधू को बड़ा खिलाड़ी बना दिया तो मां उनके खाने-पीने को लेकर सख्त हिदायत देती रहीं जो खुद वॉलीबॉल की खिलाड़ी रही हैं। मां ने ओलंपिक के दौरान अपनी बेटी को उनकी पंसदीदा बिरयानी और आइसक्रीम खाने से मना कर रखा था। मां की नसीहत के कारण उन्होंने लंबे समय से आइसक्रीम नहीं खाई थी और न ही अपने पंसदीदा व्यंजन बिरयानी को हाथ लगाया।
बिरयानी और आइसक्रीम खाने से मना करने के पीछे मां को यह डर था कि इन चीजों के खाने से वह कहीं डोपिंग में न फंस जाए और पूरी मेहनत पर पानी फिर जाए। हालांकि रजत जीतने के बाद सिंधू ने अपने कोच पी गोपींचद के साथ जमकर डिनर किया। सिंधू ने डिनर में बर्गर, पिज्जा और चाकलेट के अलावा अपनी बेहद खास चीज आइसक्रीम खाया।
सिंधू ने लाजवाब प्रदर्शन के दम पर ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाली देश की पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया। साइना नेहवाल के बाद वह बैडमिंटन में पदक जीतने वाली देश की दूसरी खिलाड़ी हैं।
तीन महीने बाद सिंधू को फोन वापस करेंगे कोच गोपी
ओलंपिक से पहले पीवी सिंधू अपने कोच पुलैला गोपीचंद के मार्ग-निर्देशन में कड़ी तैयारियों में लगी थीं। कड़ी ट्रेनिंग के अलावा अनुशासन को लेकर गोपी काफी सख्त माने जाते हैं।
अभ्यास से लेकर खुराक तक का टाइमटेबल तय कर रखा था। मिशन मेडल के दौरान खान-पान को लेकर भी काफी एहतियात बरती गई थी। ज्यादा वसायुक्त भोजन की अनुमति नहीं थी। फाइनल में हार के बाद गोपी ने यह रहस्य खोल ही दिया।
अपनी शिष्या के बेहतरीन प्रदर्शन से गदगद गोपी ने कहा, "तीन महीने से सिंधू का मोबाइल मेरे पास ही था अब उन्हें दे दूंगा।" मुस्कुराते हुए कहा कि अब तो उन्हें अपना पसंदीदा भोजन मीठा दही, आइसक्रीम और हैदराबादी बिरयानी भी खाने की पूरी छूट है।
पूर्व ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन खिलाड़ी ने कहा कि फाइनल में सिंधू जितना बेहतर कर सकती थीं उन्होंने किया, लेकिन कैरोलिना मैरिन बेहतर खिलाड़ी हैं लेकिन हार कर भी सिंधू ने काफी कुछ सीखा है। अगली बार कैरोलिना के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। फाइनल के बाद कोच की क्या प्रतिक्रिया थी इस पर गोपीचंद ने कहा, "मैंने उनसे यही कहा कि इसे फाइनल की हार के रूप में नहीं ऐतिहासिक पदक जीत के रूप में लो।"
सिंधू के लिए कोच गोपीचंद ने बनाई थी खास योजना
रियो ओलंपिक के फाइनल में पहुंचकर इतिहास रचने वाली पीवी सिंधू ने गुरु-शिष्य की पुरानी परंपरा को 21वीं सदी में नए आयाम लिखने पर मजबूर कर दिया। यह कोच गोपीचंद ही थे जिन्होंने सिंधू के ओलंपिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन की इबारत लिखी।
साइना नेहवाल के साथ छोड़ने के बाद ओलंपिक में कुछ कर गुजरने का सपना देख रहे गोपीचंद ने सिंधू के लिए अपनी एकेडमी में कुछ ऐसा अभ्यास कार्यक्रम बनाया जो उन्होंने अपने खेलने के दौरान भी नहीं किया। यह ब्रहमुहूर्त में गोपीचंद की पीवी सिंधू के साथ अकेले ट्रेनिंग का ही नतीजा है जो हैदराबाद की इस शटलर ने ओलंपिक के फाइनल में पहुंचकर पूरा करके दिखाया है।
गोपी ने सिंधू को साफ तौर पर यह आदेश दे रखा था कि वह सुबह चार बजे उनकी एकेडमी में आएंगी और वह ओलंपिक के लिए उनकी कमजोरियों पर काम करेंगे। खुद गोपी सुबह चार से छह बजे तक अकेले उनकी कमजोरियों पर काम करा रहे थे। गोपी ने खुद उनके साथ खेलकर उन्हें मानसिक रूप से मजबूत किया जिसका रंग अब रियो में दिखाई पड़ा है।
गोपी पर पूरी भारतीय टीम का भार होने के साथ उनकी अकेडमी के खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने का भी बोझ था। ऐसे में सिंधू को किस तरह खास तरह से अभ्यास कराया जाए इसके लिए उन्होंने ब्रह्ममुहूर्त का चयन किया।
2001 में ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन का खिताब जीतने के बाद बैडमिंटन रैकेट को खूंटी पर टांगने वाले गोपी ने सिंधू को सुबह चार बजे एकेडमी में आने के निर्देश दिए जिसे सिंधू ने स्वीकार कर लिया। इस सत्र में गोपी खुद रैकेट लेकर सिंधू की खामियों पर काम करते थे इनमें उनकी लंबी रैलियों से खेलने की बचने की आदत और नेट पर उनकी कमजोरियों को दूर कराया जाता था। जो सेमीफाइनल में नोजोमी ओकुहारा के खिलाफ उनके मजबूत पक्ष के रूप में देखने को मिला। इसके बाद ही छह से आठ बजे के सत्र में वह भारतीय टीम के साथ अलग से अभ्यास करती थीं।