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आत्मा और मृत्यु का यह सच अब तक आपने नहीं जाना होगा

Wed, 31 Dec 2014 01:10 PM IST
Updated Wed, 31 Dec 2014 01:10 PM IST
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scientific research on soul and death

भौतिकवादी दर्शनशास्त्र (मैटेरियलिस्टक फिलॉसफी) का मानना है कि मृत्यु जीवन का अंत है लेकिन विज्ञान के सामने जो नए नए तथ्य सामने आ रहे हैं, उनके अनुसार मृत्यु जीवन का अंत नहीं बल्कि एक पड़ाव भर है। शरीर और उसके बाहर की दुनिया में अस्तित्व की ईकाई से जुड़ी कुछ चीजे हैं जिनका कभी नाश नहीं होता।

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प्रयोगों और अध्ययन निष्कर्षों के बाद यह भी नहीं कह सकते कि पदार्थ नष्ट हो गया या पुराना पड़ गया। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डॉ. स्टीवेन्सन नवंबर 2014 में भारत आए थे।
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आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक सेमिनार में उन्होंने बताया कि मृत्यु के बाद शरीर और चेतना का एक एक अंश कायम रहता है। उनका रूप भर बदल जाता है। अणु के एक भाग विद्युतकण (इलेक्ट्रान) की संरचना और गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि यह पदार्थ का विद्युत आवेश मात्र है।

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और फिर होता है पुनर्जन्म

scientific research on soul and death

शरीर का जब रूपांतरण होता है तो यह ऊर्जा केन्द्र (सेन्टर ऑफ एनर्जी) में वाष्पीकृत हो जाता है। पदार्थ का अस्तित्व भले ही समाप्त हो गया लगता हो परंतु वह ऊर्जा (एनर्जी) के रूप में बदल कर नए नए रूप और आकार लेता जाता है। पदार्थ में भार होता है, पर ऊर्जा (एनर्जी) में कोई भार नहीं रह जाता।

उन्होंने बताया कि इस तरह की शोध करते हुए करीब 500 मामलों का अध्ययन किया है। उनका मिला जुला अनुभव है कि वयक्ति ही नहीं पदार्थ का भी पुनर्जन्म होता है। व्यक्ति के संदर्भ तो इसे काल्पनिक कहा ही नहीं जा सकता।

आहियोवो के मनस्विद राबर्ट ब्लेचफोर्डर मानते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म जैसी अलग अलग कोई विधाए हैं ही नहीं। संसार या उसके घटकों को जानने समझने के दो अलग अलग उपाय हैं। इस सच की व्याख्या को ब्लेचफोर्ड के नाम से जाना जाने लगा है।

इसलिए मृत्यु और आत्मा का पूरा भेद नहीं खुल पाता है

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उनके अनुसार जहां तक विज्ञान की पहुंच है उसे समग्र बनाने के लिए आध्यात्मिक सच्चाइयों या पारिभाषिक शब्दों के साथ संगति बिठा कर देखना चाहिए। विज्ञान के निष्कर्षों को धर्म अध्यात्म की अभिव्यक्तियों की रोशनी में देखें तो कहीं कोई विवाद ही नहीं है।

ज्ञान और अनुभूति के लिए विचार और भावनाओं की शक्तियां काम देती हैं और इनका विकास धार्मिकता के अन्तर्गत आता है। मनुष्य पदार्थ और भावनाओं का मिला-जुला स्वरूप है इसलिए सम्पूर्ण सत्य की खोज के लिए दोनों का विश्लेषण आवश्यक है।

अकेला विज्ञान भावनाओं की परिधि तक पहुंच कर रुक जाता है जबकि धर्म भी पदार्थ को जानकारी न दे सकने के कारण मनुष्य को उसके भौतिक आकर्षण से नहीं बचा पाता।

इसलिए विकास और अंतिम सत्य की खोज तभी संभव होगी जब इनमें से किसी को भी छोड़ा न जाय। पदार्थ के रूप में विज्ञान भी आंतरिक सत्ता का उद्घाटन करता है। धर्म के क्षेत्र में परमात्मा एक विश्व व्यापक शक्ति है और पदार्थ भी शक्ति के ही कण हैं।

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