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क्या अब 50 साल तक वैज्ञानिक नए आविष्कार नहीं कर पाएंगे?

Sun, 15 Mar 2015 11:40 AM IST
Updated Sun, 15 Mar 2015 11:40 AM IST
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धरती पर मनुष्य को आए करीब पांच अरब साल हो गए हैं। लेकिन हमें पांच हजार साल से ज्यादा इसका इतिहास नहीं पता। इन पांच हजार साल में जितना विकास हुआ, पिछले पांच सौ वर्ष में हुआ विकास उसकी तुलना में ज्यादा है। और पिछले पचास साल में हुआ जितना विकास हुआ वह पांच सौ से भी ज्यादा है।

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सेंटर फार ब्रेन एंड कार्गिनिशन केलिफोर्नियां के निदेशक प्रोफेसर बीएस रामचंद्रन का कहना है कि पिछले बीस साल में उन वर्षों के हुए विकास से भी ज्यादा विकास हुआ। अब हम सिचुरेशन की अवस्था में पहुंच रहे हैं। उनके अनुसार वजह यह है यह सारा विकास स्नायु विज्ञान में हुई नई नई खोजों के कारण है। अब अगले पचास साल में कोई नया अविष्कार नहीं होगा। आविष्कार अर्थात मौलिक प्रयोग। अगर कोई खोज हुई भी तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र में होगी।
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जनवरी 2015 शिकागो में हुए विश्वधर्म सम्मेलन में इकट्ठे हुए धुंरंधर धर्म और विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहे मनीषियों ने अपने अनुभवों और प्रयोगों को साझा किया। वे इस नतीजे पर पहुंचे कि जब तक हम अपने चलने फिरने और रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली चीजों की तरह ईश्वर से परिचित नहीं हो जाते तब तक कोई प्रयोग और आविष्कार मनुष्य का भला नहीं कर सकता।

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मनुष्य उनसे लाभ उठाने के बजाए अपना नुकसान ही करेगा

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यह जानना जरूरी है कि शून्य से संसार का जन्म कैसे हुआ और संसार का सम्यक उपयोग कैसे किया जा सकता है। प्रसिद्ध स्नायुविज्ञानी चार्ल्स स्टेनामेंट ने अपनी फाइल में रखे रिकार्डों के हवाले से चिंता जताई कि पारलौकिक किस्म के अनुभवों की व्याख्या किए बिना आगे बढ़ना कितना मुश्किल है। कोटार्ड सिंड्रोम (एक मनोव्याधि) के शिकार व्यक्ति रौजर गुटबर्ग का कहना था कि अब वह जीवित ही नहीं है।

अपने बोध से हद दर्जे तक रिक्त हो चुके बरसों पुराने उस रोगी को ध्यान कराया गया। छह सप्ताह तक किए गए ध्यान प्रयोग में गुटबर्ग का बोध जागृत होने लगा। वहां मौजूद आठ चिकित्सकों ने गुटबर्ग की केस फाइल देखी और कहा कि इस तरह के परिणाम संभव ही नहीं थे।

धर्म आस्था और विज्ञान के मेल से नए मनुष्य के विकास में मदद मिल सकती है। अगर इन विधाओं के बीच सेतु नहीं बनाया गया तो कितने ही नए संसाधन विकसित कर लिए जाएं, मनुष्य उनसे लाभ उठाने के बजाए अपना नुकसान ही करेगा।

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