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सिर्फ 16 साल और सूख जाएगी पवित्र गंगा नदी?

Mon, 09 Jun 2014 01:32 PM IST
Updated Mon, 09 Jun 2014 01:32 PM IST
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करीब ढाई हजार किलोमीटर लंबी गंगा नदी के बारे में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो इसे सदानीरा बनाए रखने वाला हिमनद सिर्फ सोलह साल और किसी न किसी तरह जिंदा रहेगा।

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उसके बाद यह पूरी तरह लुप्त हो जाएगा। आशय यह है कि गंगोत्री ही सूख जाएगी तो गंगा में वह पानी कहां से आएगा जिसे बड़े आदर के साथ नीर और जल कहा जाता है।


गंगा जल में अब वह बात नहीं

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सीलिसबर्ग स्थित महर्षि वैदिक इंस्टीट्यूट की चिंता दूसरी तरह की है। इंस्टीट्यूट के कराए अध्ययन के मुताबिक गंगा नदी और उसके स्रोत गंगा ग्लेशियर को किसी तरह फिर भी बचा लिया जाए, और गंगा नदी बहती रहे। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उसकी तीर्थवत्ता बनी रहे।

गंगा के पवित्र होने की बात शुरु से प्रचलित है। इसका वैज्ञानिक आधार सिद्ध हुए वर्षों बीत गए। उसके अनुसार नदी के जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु गंगाजल में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते।

गंगाजल में प्राणवायु की प्रचुरता बनाए रखने की अदभुत क्षमता है। इस कारण पानी से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का खतरा बहुत ही कम हो जाता है। लेकिन अब वह बात नहीं रही।

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गंगा आखिर कैसे बन गई गंदाजल

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गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। गंगा-जल न पीने के योग्य रहा, न स्नान के योग्य। महर्षि इंस्टीट्यूट के निदेशक डा. अर्जुन गोड़दिया के अनुसार इस संकट का निवारण थोड़ी सी जागरूकता और इंतजामों से हो सकता है।

लेकिन जो विशेषताएं गंगा स्नान कर या उसके किनारे रह चुके लोगों को या वहां के वातावरण को जिस ऊर्जा से भर देती हैं, उन्हें लौटा लाने को कोई उपाय नहीं है।

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गंगा किनारे तीर्थ और स्नान के नियम

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कम से कम कुछेक वर्षों में तो कतई संभव नहीं है। उनके अनुसार किसी समय ढाई हजार किलोमीटर क्षेत्र में फैली गंगा के किनारे छोटे बड़े आठ सौ तीर्थ हुआ करते थे। इन तीर्थों में रहने, जाने और स्नान आदि करने का अनुशासन था।

अंपायर आफ द मुगल पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक अलक्स रदरफोर्ड ने लिखा है कि करीब छह सौ साल के सल्तनत और मुगल काल के शासन में भी इन तीर्थों की आंतरिक संरचना और व्यवस्था में कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई।

लेकिन पिछले साठ वर्ष में बाजारवाद और आधुनिकता अभिमानी तंत्र ने तीर्थों की उस व्यवस्था को तहस नहस कर दिया। अब उस व्यवस्था का न जानकार हैं और न ही उसे ढूंढा व खोज सकने वाला तंत्र। ऐसे में उस व्यवस्थित करने वाली ऊर्जा और ज्ञान का भी अंनुसंधान किया जाना चाहिए।

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