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शरीर और आत्मा का ऐसा नाता आपने कभी सोचा भी नहीं होगा

Sat, 10 May 2014 11:45 AM IST
Updated Sat, 10 May 2014 11:45 AM IST
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relation with soul and body

अगर कोई कहे कि आप बीमार हैं तो बुरा नहीं लगता। कभी कभार तो कहने वाले के प्रति मन कृतज्ञता से भर उठता है कि कितना भला है यह आदमी की हमारी इतनी फिक्र कर रहा हैं। लेकिन कोई कहे कि आपका मन बीमार है तो पीड़ा होती है।

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पीड़ा के साथ गुस्सा भी आता है कि उसने अपमान कर दिया। शरीर को रोगी बताने पर इसलिए बुरा नहीं लगता कि वह पराया लगता है। मन अपने ज्यादा निकट प्रतीत होता है। लगता है वही अपना मूल अस्तित्व है।

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शरीर विज्ञानी ने जाना यह सत्य

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अरुणाचल में महर्षि रमण केंद्र में साधक रहे शरीर विज्ञानी डा. एच एन हरित का ध्यान लोगों की इस तरह की प्रतिक्रिया पर गया। उन्होंने इस तरह की प्रतिक्रिया करने वालों को बारीकी से देखा समझा और पाया कि मनुष्य का चित्त स्थूल शरीर से ज्यादा जुड़ा नहीं है।

इसीलिए शरीर के संबंध में कुछ बुरा कहें तो सहन हो जाता है पर मन के बारे में कहे तो बर्दास्त नहीं होता। महर्षि रमण के उपदेशों और साधकों के अनुभवों के आधार पर डा. हरित का कहना है कि मन और शरीर दो नहीं है।

मन शरीर की भीतरी परत है। वह मूल चेतना के ज्यादा करीब है। उसी अस्तित्व की बाहरी परत शरीर है।


इसके द्वारा पूर्वजन्म का ज्ञान मिलता है

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मृत्‍यु में बाहरी शरीर गिर जाता है। लेकिन भीतर की सूक्ष्‍म परत, जिसे योग की भाषा में मनस शरीर कहते है दिवंगत हो चुके व्यक्ति के साथ ही जाता है।

अस्तित्व से इतनी आसक्‍ति है कि मृत्‍यु भी उसे अलग नहीं कर पाती। उसी मनस शरीर की बदौलत पिछले जन्‍मों को जाना जा सकता है।
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इस तरह नया शरीर मिलता है

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लेडबीटर, मैडम ब्लेवटेस्की, रेवरेंड मूडी, प्रो. बीडी ऋषि, और केएस रावत जैसे कई विद्वानों ने इस दिशा में काम किया है। उनके निष्कर्षों को देखें तो यह पाएंगे कि मृत्‍यु किसी को नष्ट नहीं करती। शरीर भले ही खोता दिखाई दे, उसका आंतरिक अस्तित्व कायम रहता है। वह बहुत ही सूक्ष्‍म है, ऊर्जा की तरंग की भांति।

व्यक्ति उसे साथ लिए चलता है। उन तरंगों के अनुरूप ही नए शरीर में प्रवेश होता है। विचारों, वासनाओं और आकांक्षा के अनुकूल अपने लिए नया शरीर मिल या बन जाता है। मनस शरीर में उसकी रूपरेखा हमेशा मौजूद है।


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