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दान देकर कहीं आप भी तो पाप नहीं कर रहे?

Mon, 03 Mar 2014 11:46 AM IST
ज्योतिर्मय/अमर उजाला, दिल्ली।
ज्योतिर्मय/अमर उजाला, दिल्ली। Updated Mon, 03 Mar 2014 11:46 AM IST
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reality of donation in spirituality

दान किसी वस्तु पर अपना अधिकार समाप्त करने का नाम है। लेकिन चोर डाकू के हाथों लुटने और अपना काम निकालने के लिए दिए रिश्वत में भी अपनी गांठ ढीली करनी पड़ती है। उसे तो दान नहीं कहते।

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गुजरात के द्वारका में धार्मिक परंपराओं और मूल्यों पर अनुसंधान कर रहे कृष्णचरणामृत संघ (एसकेसीएस) के का कहना है कि दान जिस तिस को किसी भी तरह और कुछ भी दे देने की नाम नहीं है।
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इस तरह दी गई वस्तुओं से दूसरों का हित भले ही सध जाए पर जरुरी सावधानियां नहीं बरती गईं तो अपना नुकसान ही होता है। कम से कम कोई फायदा तो नहीं होता। दान के प्रभाव को जानने के लिए एसकेसीएस के विद्वानों नें 30 तीर्थ स्थानों पर दान देते लोगों से बातचीत की।
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अध्ययन में उन लोगों को भी शामिल किया जो दान दे चुके थे और जिनकी अपेक्षाएं पूरी हुई थी। और उन लोगों को भी जो दान धर्म के खिलाफ थे उन पर इस कृत्य के कुछ अनुभव रखे थे।

दान के बारे में तमाम लोगों का एक अनुभव सामान्य रहा कि दान के बदले किसी तरह का विनिमय नहीं होना चाहिए। जो दान पवित्र स्थान में, शुभ समय में शुभ तिथियों में और दिन के हिसाब से सुबह या दोपहर के समय बिना किसी बदले और आशीष की कामना से किया गया है, वह व्यक्ति के चित्त को परिमार्जित करता है।

अपने पर किए गए किसी उपकार के बदले में या मजबूरी में किए गए दान का कोई लाभ नहीं होता। अपवित्र स्थान और अनुचित समय में बिना सत्कार के किए गए दान का तो नुकसान ही होता है।

दान देने वाले की भावना और लेने वाले का स्तर दोनों ही महत्वपूर्ण है। इन में सामंजस्य होना चाहिए। आप कितनी ही अच्छी भावना से दें और लेने वाला उसे अनापशनाप कामों में लगा दे तो देने वाले का नुकसान ही होता है।


देखा गया कि अनीति से की हुई कमाई को दान किया गया तो वह राशि निश्चित रुप से गलत कामों में ही लगेगी।

ऊपर बताए गए तीस लोगों में सात मामलों में तो ऐसा देखने में आया कि दिए गए दान की राशि गलत तरीकों से अर्जित की गई थी। और जिन हाथों में वह गई उन्होंने उसका उपयोग मौजमस्ती में किया।

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