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पता चल गया हम दिमाग से नहीं कहीं और से सोचते हैं

Mon, 12 May 2014 12:43 PM IST
Updated Mon, 12 May 2014 12:43 PM IST
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not brain we thought from navel

अभी तक समझा जाता था कि विचार और संतुलन का केंद्र मनुष्य का मस्तिष्क है। यहीं भूरे रंग का वह पदार्थ (ग्रे मैटर) है जो व्यकि के सोच विचार और निर्णय को प्रभावित करता है।

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लेकिन योगशास्त्र का कहना है असली केंद्र तो नाभि है। माना कि विचार और विश्लेषण का काम दिमाग करता है, पर उसे अमल में लाने का फैसला इसी केंद्र से आता है।

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मां से आपके लगाव का असली कारण तो जानिए

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योग और शरीर विज्ञान पर काम कर रहे इंडोनेशिया स्थित बालीद्वीप के द लोटस सेंटर के शोघ विज्ञानियों का कहना है कि जन्म लेते ही जिस नालरज्जु को काट कर मां से बच्चे को अलग किया जाता है, वह बाद में भी जुड़ा रहता है।

अब जुड़ाव का आधार विद्युत कंपन या सूक्ष्म तंरगें होती है जिन्हें फिलहाल परिभाषित नहीं किया जा सका है। उस जुड़ाव के कारण ही व्यक्ति की भाव संवेदना मां के प्रति बनी रहती है।

जब मां के गर्भ से बच्चे का जन्म होता है

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लोटस सेंटर के निदेशक डा. हाशिम नासर ने केंद्र के शोधपत्र में लिखा है कि जन्म के बाद जब बालक रोता, हाथ-पैर चलाता है और रक्त संचार आरम्भ हो जाता है। हृदय से रक्त फेफड़ों में पहुंचता है और वे सक्रिय हो जाते हैं। अब मां के गर्भाशय में स्थित ‘प्लेसेंटा’ रूपी फेफड़ों की उसे जरूरत नहीं रह जाती। चिकित्सकों की राय में इस केन्द्र की उपयोगिता एक सामान्य गड्ढे के रूप में ही रह जाती है।

लिगामेण्टम टेरिस जैसे कुछ निरर्थक निष्क्रिय सूत्रों के जरिए नाभि लीवर से जुड़ी रहती है। लेकिन जब भी कभी लीवर पर दबाव पड़ता है तो यही निष्क्रिय सूत्र जीवन्त हो जाते हैं व ‘केपट मेड्यूसि’ के रूप में फूली शिराओं के स्वरूप में दिखाई देते हैं।

डा. हाशिम नासर के अनुसार नाभि का यही केंद्र व्यक्ति में संकल्प जगाता है। आपको याद होगा कि जीवन में कभी कभार ऐसे पल भी आते हैं जब भावों, विचारों और विश्लेषणों को एक तरफ रख कर अचानक कोई फैसला करते हैं और वह अक्सर सही साबित होता है।

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आखिर कैसे आपके लिए फैसले सही साबित होते हैं

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उसके नतीजे आते है। शोध पत्र के अनुसार यह नतीजे नाभिकेंद्र से लिए गए फैसलों के कारण ही होते हैं। इन फैसलों को संकल्प के रूप में देखा जा सकता है। रहस्यवादियों की भाषा में इसे अतींद्रिय शक्ति का प्रभाव या दैवी सहायता कहा जाता है।

योगगुरु आयार्य भगवानदेव के अनुसार योगशास्त्रों में इस केंद्र की पहचान मणिपूरक चक्र के रूप में की गई। पत्र, दल, पंखुडियां और बीज अक्षरों के जरिए यह विद्या भी संकल्प के इसी केंद्र के महत्व और उपयोग को बताती है।



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