दूध पीते हैं तो जान लीजिए, फायदे कुछ नहीं नुकसान कितने है
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यह धारणा गलत साबित हो रही हैं कि अपने आहार में दूध भी शामिल रखने वाले लोग सात्विक भोजन करते हैं। प्रोटेस्टेंट ईसाइयों की एक छोटी सी शाखा क्वेकर संप्रदाय के अनुयायियों ने तो सत्रहवीं शताब्दी से ही दूध और उससे बने आहार का निषेध शुरु कर दिया था।
उनका कहना था कि दूध मांसाहार भोजन है अर्थात पशुओं से प्राप्त होने वाले मांस की तरह है। उनके अनुसार बच्चा जब तक अपनी मां का दूध पीता है तभी तक ठीक है। उसके दो तीन साल का होने के बाद मां जब स्तनपान नहीं करा पाती तो समझ लेना चाहिए कि दूध की जरूरत खत्म हो गई।
वासना और हिंसा को बढ़ाते हैं दूध
शरीर विज्ञानियों के अनुसार अब बच्चे का शरीर बन गया। उसे सामान्य भोजन दिया जाना चाहिए। मुंबई स्थित हाफकिंस रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधार्थियों की टीम के डा. एस बुद्धिराजा का कहना है कि किसी भी पशु का शिशु जन्म के कुछ समय बाद ही दूध पीना छोड़ देता है।
सिर्फ आदमी ही अपवाद है। सभी पशु अपनी मां का दूध पीते है। आदमी ही है जो दूसरों की माताओं का, यहां तक जानवरों की माताओं का भी दूध पीता है। डा बुद्धिराजा के अनुसार दूध से जो भी पदार्थ बनते हैं वे वासना और हिंसा को बढ़ाते हैं। इसका कारण है कि दूध और शरीर से निकाले गए मांस से अतिरिकित ऊर्जा मिलती है।
दूध पीने से सांड जैसे गुण
क्वेकर संप्रदाय से सैंकड़ों साल पहले जैन धर्म पंरपरा ने कहा कि दूध उपयोगी नहीं है। योग और ध्यान के साधक के लिए वह नुक्सानदेय है। फिर पशुओं का दूध तो निश्चित ही पशुओं के लिए है।
जब एक गाय दूध देती तो मानवी शिशु के लिए नहीं देती अपने बच्चे के लिए देती है। जब मनुष्य का बच्चा या खुद मनुष्य उस दूध को पीता है तो उसके भीतर सांड जैते संस्कार आ जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं है।
दूध पीने का यह नुकसान आप खुद जान लेंगे
डा. बुद्घिराजा का कहना है कि आज नहीं कल ख्याल में आएगा कि आदमी में बहुत सी पशु प्रवृतियां है तो उनका कारण दूध पीना ही हो सकता है उस आहार के कारण ही पशु प्रवृतियों को बल मिलता है।
मनुष्य का आहार अभी तक तय नहीं हो पाया है, लेकिन शरीर विज्ञानी के अनुसार उनका आहार शाकाहारी ही हो सकता है। दूध मांसाहार का हिस्सा है।