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दिव्य शक्तियां पाना चाहते हैं तो इन बातों का रखें ध्यान?

Sat, 04 Oct 2014 05:34 PM IST
Updated Sat, 04 Oct 2014 05:34 PM IST
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meditation within eternity

अगर आप प्रतिदिन ध्यान, पूजा या मंत्रजप कर रहे हैं और उसके अच्छे परिणाम सामने नहीं आ रहे या तनाव पैदा करने वाले कारण सामान्य जीवन में आ रहे हैं तो निराश होने की जरूरत नहीं है।

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योगी हरिहरानंद आरण्यक का कहना है कि कम से कम दस ऐसे अनुभव ऐसे हैं जो इस बात के प्रतीक हैं कि आपकी साधना सही दिशा में जा रही है।

यह भी कि आप जिस उद्देश्य से जप तप साधना कर रहे थे, उस उद्देश्य के करीब पहुंच रहे हैं। इन अनुभवों में एक से ज्यादा शरीरों का अनुभव होना, सूर्य के सामान दिव्य तेज का पुंज या दिव्य ज्योति दिखाई देना, शून्यस्थिति का अनुभव होना है।

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आंखें बंद होने पर भी सब कुछ दिखना

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हम संसार को पूरी तरह भूल जाते हैं (ठीक वैसे ही जैसे सोते समय भूल जाते हैं), आंखें बंद होने पर भी बाहर का सब कुछ दिखाई देना, दीवार-दरवाजे आदि के पार भी देख सकना, बहुत दूर स्थित जगहों को भी देख लेना, भूत-भविष्य की घटनाओं को भी देख लेना शामिल है।

इस तरह के अनुभव आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) के खुलने पर अनुभव होता है और होने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाना है।

बहुत बार इस तरह के अनुभव किसी मानसिक विकार के कारण भी होते हैं, पर स्वामी हरिहरानंद का कहना है कि गुरु या अनुभवी साधक इस तरह के अनुभवों के बारे में समझ जाते हैं। अक्सर उस साधक को सचेत भी कर देते हैं, जो ईमानदारी से इस दिशा में काम कर रहे हैं।

अनुभव किसी मनोविकार के कारण हैं या योग की सफलता के सूचक, यह बात साधक के व्यवहार और स्वभाव में आ रहें बदलावों के आधार पर होती है।

जिन्हें दिव्य शक्तियां मिल जाती हैं

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योगी हरिहरानंद के सान्निध्य में करीब छह सौ साधकों ने योग ध्यान का अभ्यास किया। उन साधकों में योग की सात स्थितियों को पार कर चुके साधकों का विश्लेषण करते हुए स्वामीजी ने कहा कि प्राथमिक स्तर पर तो विक्षिप्त और सिद्धि की ओर बढ़ रहे योगी का स्थिति एक जैसी होती है।

अंतर पांचवीं या छठी स्थिति के बाद दिखाई देता है। साथक स्तर का व्यक्ति अपनी विशेषताओं को दबाता छुपाता है जबकि योगभ्रष्ट साधक या छद्मयोगी अपने बारे में खास कर अपनी योगक्षमताओं के बारे में बढ़ चढ़ कर बातें करता है।

इस मोटी पहचान के अलावा योगभ्रष्ट व्यक्ति दूसरों को परखने जांचने में ज्यादा रुचि लेता है, जबकि ईमानदार नैष्ठिक साधक चुपचाप अपने काम में लगा रहता है।


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