गणित के जरिए स्वर्ग में बना सकते हैं अपने लिए स्थान
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योगीजनों और अध्यात्मशास्त्रियों का मानना है कि गणित के माध्यम से निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। पता नहीं यह सही है या नहीं है, पर इतना जरूर है कि संख्याओं के जरिए वह ज्ञान विज्ञान सीखा और गूढ़ पहेलियों को आसानी से सुलझाया जा सकता है जो विज्ञान या शोध अनुसंधान और प्रयोग की किसी और तकनीक से कतई हल नहीं किया जा सकता।
जरूरी है कि गणित का वह अभ्यास कंप्यूटर और इलेक्ट्रानिक उपकरणों के जरिए न हो। उसके लिए प्रयोगकर्ता का शारीरिक और मानसिक जौर पर गणित से जुड़ा होना जरूरी है।
आईआईटी मुंबई के प्रोफेसर कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम का कहना है कि संख्याओं की बारीकी में न जाएं और सिर्फ शून्य को ही देखें तो उसे देखने की प्रक्रिया में ही अद्भुत शांति का अनुभव होता है। बौद्ध दर्शन में शून्यवाद का महत्व अकारण ही नहीं है।
गणित की अद्भुत पद्धति
मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर जॉर्ज गैवगीज जोसेफ का कहना है कि भारत के योगियों और अध्यात्मविदों द्वारा दी गई गणित की पद्धति अद्भुत है।
इसमें बड़ी से बड़ी संख्या को बहुत आसानी से और कम से कम संख्या के जरिए व्यक्त किया जा सकता हैं। उनका यह भी कहना है कि इसकी वजह गणित का संबंध जीवन, मृत्यु और निर्वाण के दर्शन से जुड़े रहना भी है।
विज्ञान विषयों के लेखक एलेक्स बेलौस का कहना है कि हालांकि हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में संख्याओं और निर्वाण के आपसी संबंध की अलग-अलग व्याख्या की गई है। आमतौर पर बातचीत के दौरान भी हम संख्याओं का प्रयोग करते हैं।
गणित के कुछ संख्याओं को खास तरह से दोहराना
साधना के क्षेत्र में संख्याओं का संबंध मुक्ति और आनंद से जोड़ा जाता था, पर बाद में कहा जाने लगा कि यह संतुष्टि हासिल करने का ही एक तरीका है, और कुछ नहीं।
यह सुधारवादी मान्यता भी ध्वस्त होने लगी है। मैनचेस्टर इंस्टीट्यूट आफ एंशियंट मेडिकल साइंस के ताजा प्रयोगों में देखा गया कि गहन चिकित्सा के लिए रोगियों को एनस्थीसिया देने के बजाय गणित के कुछ संख्याओं को खास तरह से दोहराना ज्यादा कारगर साबित हो रहा है।
बड़ी उम्र के लोगों की शल्य चिकित्सा के लिए तो यह प्रयोग बेहद कारगर साबित हुआ है।