वरदान की तरह चमत्कारी गणित, पा सकते हैं कामयाबी और सुख
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कोई जरूरी नहीं है कि जप तप ध्यान योग से जिंदगी में आंतरिक बहार आए। आंतरिक बहार अर्थात सुख शांति, सामंजस्य, उन्नति और कामयाबी आदि जिनके बारे में समझा जाता है कि इसके लिए ईश्वर की कृपा जरूरी है। रोजमर्रा की जिंदगी जीते हुए भी वैसी स्थितियां पाई जा सकती है।
भारत के पिछली खोजों का जायजा लेते हुए मनीषी इस नतीजे पर पहुंचने लगे हैं कि वह उपलब्धि गणित से भी हासिल की जा सकती है।
पश्चिमी मीडिया के जाने माने लेखक एलेक्स बेलौसा की कहना है कि गणित की इन्हीं संभावनाओं का उपयोग करते हुए भारत ने हजारों साल पहले अंकों की खोज की और उनका इस्तेमाल भी शुरु किया।
चमत्कारी गणित की ऐसे खोज हुई
संख्याओं के चमत्कारिक तोहफे के अलावा गणित से लेकर भाषा और अभिव्यक्ति के तमाम माध्यमों में काम आने वाले शून्य का आविष्कार भी भारत में ही हुआ। इसके आधार पर गणित की सारी बड़ी गणनाएं होती हैं।
लेकिन उस मुगालते में मत रहिए कि गणित की खोज जिंदगी को आसान बनाने या दुनियावी उपलब्धियां हासिल करने के सिलसिले में हुई। इस विद्या या तकनीक का पता दूसरी और विद्याओं की तरह मुक्ति, निर्वाण या ईश्नर की खोज करते हुए लगा।
शून्य अंक का चमत्कार
संस्कृत के विद्वान श्रीधर शास्त्री के अनुसार दस से सत्रह तक की संख्याओं को 'परार्ध' कहते हैं और परार्ध का अर्थ होता है स्वर्ग का आधा मार्ग तय होना। बौद्ध दर्शन में एक के बाद 53 शून्य लगाकर उस संख्या पर ध्यान लगाया जाता है। जैन धर्म में अनंत संख्याओं को अध्यात्म से जोड़ा गया है।
जैन दर्शन के अनुसार उन संख्याओं के ध्यान से संतुष्टि मिलती है। उनका कहना है कि गणित में शून्य को दर्शाने के लिए वृत्त का प्रयोग करने के पीछे भी दार्शनिक कारण हो सकते हैं।
लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने शून्य पर एक पुस्तक भी लिखी। पुस्तक में उन्होंने शून्य के प्रयोग के बारे बताते हुए गणित के आधारभूत सिद्धांतों की जानकारी दी है। यह जानकारी अध्यात्म से ताल्लुक रखती है।