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मनुष्य को अपनी किसी भी खोज के लिए इतराने की जरूरत नहीं है
ज्योत्सना
Updated Sat, 09 Jun 2018 10:20 AM IST
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शरीर में लगभग साठ अरब कोशिकाएं हैं। प्रत्येक कोश हजारों पावर स्टेशन, परिवहन और संचार संस्थान की मिली-जुली व्यवस्था वाले एक शहर की तरह है। कच्चे माल का आयात, नया माल होने और बचे हुए पदार्थों को निकाल फेंकने की प्रकिया बराबर चलती रहती है। इन कोशिकाओं का व्यवहार और काम देखें तो एक समर्थ प्रशासन की झांकी देखने को मिलती है।
जीवकोश कितने सूक्ष्म होते हैं, इसका अनुमान लगाना चाहें तो इस आधार पर लगा सकते हैं कि एक करोड़ कोशिका आराम से एक पिन के सिरे पर बैठ सकते हैं। शरीर के बारे में इस तरह की बारीकियों का पता तो अरसा पहले चल गया था। नई जानकारी यह है कि बाहरी दुनिया या समाज में हम जिस व्यवस्था और सुशासन को लाना चाहते हैं, वह कहीं बाहर से नहीं, अपने भीतर की अतल गहराइयों से ही आती है।
व्यक्ति के गुण, कर्म, विचार और भावों के लिए जिन गुणसूत्रों (जीन्स) को अक्सर जिम्मेवार ठहराया जाता है, वे जन्म से बहुत पहले मनुष्य की चेतना में आ विराजे थे। जर्मनी के पिट्सवेलि इंस्टीट्यूट के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. एसटी कोवे का कहना है कि मनुष्य को अपनी किसी भी खोज के लिए इतराने की जरूरत नहीं है।
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वह किसी खोज का दावा भी नहीं कर सकता, क्योंकि हम जो कुछ भी सोचते हैं, वह कुदरत में पहले से मौजूद है। उसकी मौजूदगी ही वे तरंगें उत्पन्न करती हैं, जो हमारी जिंदगी को आसान और व्यवस्थित करती है।
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जीवकोश कितने सूक्ष्म होते हैं, इसका अनुमान लगाना चाहें तो इस आधार पर लगा सकते हैं कि एक करोड़ कोशिका आराम से एक पिन के सिरे पर बैठ सकते हैं। शरीर के बारे में इस तरह की बारीकियों का पता तो अरसा पहले चल गया था। नई जानकारी यह है कि बाहरी दुनिया या समाज में हम जिस व्यवस्था और सुशासन को लाना चाहते हैं, वह कहीं बाहर से नहीं, अपने भीतर की अतल गहराइयों से ही आती है।
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व्यक्ति के गुण, कर्म, विचार और भावों के लिए जिन गुणसूत्रों (जीन्स) को अक्सर जिम्मेवार ठहराया जाता है, वे जन्म से बहुत पहले मनुष्य की चेतना में आ विराजे थे। जर्मनी के पिट्सवेलि इंस्टीट्यूट के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. एसटी कोवे का कहना है कि मनुष्य को अपनी किसी भी खोज के लिए इतराने की जरूरत नहीं है।
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वह किसी खोज का दावा भी नहीं कर सकता, क्योंकि हम जो कुछ भी सोचते हैं, वह कुदरत में पहले से मौजूद है। उसकी मौजूदगी ही वे तरंगें उत्पन्न करती हैं, जो हमारी जिंदगी को आसान और व्यवस्थित करती है।