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अयंगर योगः पार्किंसंस के मरीजों के लिए आशा की एक किरण

रजवी एच मेहता Updated Mon, 18 Jun 2018 11:35 AM IST
Parkinson's disease
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कल्पना कीजिए आप एक व्यस्त सड़क से गुजर रहे हैं और अचानक आपको महसूस होने लगे कि आपका शरीर एकाएक जम गया है, वो हिल नहीं पा रहा है। आपको लग रहा है कि आपके पैर धरती पर ही जम गए हैं। कल्पना कीजिए कि आपके हाथों में होने वाली कंपन की वजह से आप अपनी शर्ट के बटन तक बंद नहीं कर पा रहे हो या फिर बिना कुछ गिराए अपने मुंह तक चम्मच ले जाना संभव न हो रहा हो।  कल्पना कीजिए एक ऐसा चेहरा जो सुस्त दिखाई देता हो जबकि आपकी भावनाएं खुशी व्यक्त कर रही हो। कल्पना करने की कोशिश कीजिए कि आप कुछ कहने की कोशिश कर रहे हैं और आपकी आवाज नरम पड़ने की वजह से आपका भाषण इतना धीमा हो गया है कि सामने बैठा व्यक्ति उसे सुनना भी बंद कर देता है। कल्पना कीजिए एक ऐसी स्थिति जब आप अपनी चाल को नियंत्रित नहीं कर पाते जिसके बाद या तो बहुत तेज या फिर बहुत धीमी गति से चलना शुरू कर देते हैं। एक ऐसी स्थिति जब जीवन में मिली चीजें लुप्त होने लगती हैं। 
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यह सभी बातें आपके लिए एक कल्पना हो सकती हैं लेकिन यह सब चीजें पार्किंसंस रोग से पीड़ित लोगों के लिए जीवन की एक वास्तविकता है। लगभग 100,000 लोगों में से 1,5 से 20 प्रतिशत तक के लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। खास बात यह है कि यह बीमारी 60 से ज्यादा उम्र के लोगों को प्रभावित करती है। लेकिन आजकल यह रोग पार्किंसंस युवाओं में भी देखने को मिलता है। जनसंख्या बढ़ने के साथ इसकी संख्या में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। हालांकि अक्सर लोग इस रोग के लक्षणों को बुढ़ापे से जोड़कर देखने लगते हैं। बिना ये जाने कि वो किस तरफ जा रहे हैं। 

हालांकि ये रोगी मानसिक रूप से बिल्कुल फिट होते हैं लेकिन सरल कार्यों में भी इनका धीमी गति से काम करना इन्हें सामाजिक रूप से जागरूक, आश्रित और निराश बना देता है। ऐसे लोग सामाजिक आयोजनों में भाग लेना बंद कर देते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वह बिना कुछ गिराए कुछ पी नहीं सकते, धीरे-धीरे चलते हैं या फिर कई बार ढ़ंग से चल भी नहीं पाते। ऐसे लोगों की इच्छाएं कभी भी प्रभावित नहीं होती इसलिए ऐसे लोगों को सिर्फ इस स्थिति के साथ ही रहना पड़ता है जो कि समय के साथ बढ़ती रहती है।

यह सब इसलिए होता है क्योंकि मस्तिष्क की कुछ कोशिकाएं जो न्यूरोट्रांसमीटर उत्पन्न करती हैं, डोपामाइन मर जाती है। ऐसी कई दवाएं हैं जिन्हें मौखिक रूप से डोपामाइन को प्रतिस्थापित करने के लिए दिया जाता है।  लेकिन, समय के साथ इस खुराक को बढ़ाना होता है खासकर तब जब दवा का प्रभाव कम होने लगता है और धीमापन वापस आने लगता है। इसलिए, दवा के समय का खास ध्यान रखना होता है। लेकिन बीमारी के बढ़ने पर दवा की खुराक में वृद्धि करनी पड़ती है। जिसके साथ इसके साइड इफेक्ट्स भी बढ़ने लगते हैं। मगर उनके पास इसके अलावा और क्या विकल्प है?

यहां तक कि अगर इस बीमारी का शुरुआती चरणों में ही पता चल भी जाए, तो यह बहुत निराशाजनक हो सकता है। जब कभी आप इस बीमारी के बारे में जानकारी प्राप्त करने और अपना भविष्य जानने के लिए इंटरनेट देखते हैं। पहला वाक्य जो लिखा आता है वो होता है 'पार्किंसंस रोग एक प्रोजेक्टिव न्यूरोलॉजिकल विकार है'।यह स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि जीवन बेहतर नहीं सिर्फ खराब ही हो सकता है। बता दें, इस बीमारी का नाम जेमी पार्किंसंस के नाम पर रखा गया है,डॉक्टर जेमी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने साल 1817 में ही इस बीमारी के लक्षणों को नोटिस कर लिया था। उनका जन्म 11 अप्रैल को हुआ था इसलिए विश्व पार्किंसंस दिवस 11 अप्रैल को ही मनाया जाता है। 

मुंबई के एक वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट ने ऐसे मरीजों के लिए एक सहायक समूह शुरू किया है, जहां रोगी एक साथ आकर कई गतिविधियों को करते हैं ताकि वो खुद को दूसरों से अलग न महसूस करें। 

हम पिछले 12 वर्षों से ऐसे मरीजों को अयंगर योग पढ़ा रहे हैं। ऐसा सिर्फ उन्हें बिजी रखने के लिए नहीं बल्कि उनके जीवन में एक अंतर लाने के लिए भी है। इसलिए, हमने एक वैज्ञानिक अध्ययन करके देखा कि अयंगर योग ऐसे लोगों को कैसे मदद करता है। पहले अध्ययन में 60 रोगियों को शामिल किया गया। उनमें से 30 लोगों ने 3 महीने तक अयंगर योग किया जबकि बाकी 30 लोगों ने नियंत्रण के रूप में कार्य किया। तीन महीने बाद, पार्किंसंस रोगियों के जीवन में 70 प्रतिशत सुधार देखा गया। न सिर्फ उनके जीवन में बल्कि नियंत्रण करने की स्थिति में भी काफी सुधार आया। खास बात यह है कि इस अध्ययन को सिंगापुर के न्यूरोसाइंस सम्मेलन में 6 सर्वश्रेष्ठ अखबारों में जगह दी गई। इसके बाद, कुछ मरीजों को 2 साल तक निगरानी में रखा गया। जिसमें पाया गया कि न सिर्फ ऐसे लोगों की बीमारी बढ़ने से रुक गई है बल्कि वास्तव में उनकी स्थिति में भी सुधार हुआ। जहां तक हमारा ज्ञान कहता है, यह पहली बार है जब इस तरह के किसी अवलोकन की कोई सूचना मिली हो। इस साल के शुरू में इस अध्ययन को विश्व न्यूरो पुनर्वास सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था।

इन मरीजों को क्या करना है, यह सिखाना संभव नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से उन्हें यह आश्वासन दे सकते हैं कि नियमित रूप से अयंगर योग करने से उनकी स्थिति में सुधार हो सकता है। यहां एक वीडियो दिया गया है जिसमें दिखाया गया है कि ऐसे रोगी क्या करने में सक्षम थे।

मैं मरीजों को सलाह देती हूं कि वो इस योग को स्वयं न करें ।

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