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तब बिना शरीर के यात्रा कर सकते हैं और उम्र की रफ्तार रोक सकते हैं
ज्योतिर्मय
Updated Thu, 12 Dec 2013 10:05 AM IST
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आइंस्टीन की यह खोज पुरानी हो चली है कि गुरुत्वाकर्षण के बाहर उम्र बढ़नी रूक जाती है। यदि आदमी दूर के किसी ग्रह पर जाए और वहां तक पहुंचने में तीस साल लगें, इतना ही समय पृथ्वी पर वापस आने में लगे तो आने जाने के साठ साल जोड़ कर उसकी उम्र नब्बे साल की हो जानी चाहिए। पर आइंस्टीन का कहना था कि साठ साल बाद वह व्यक्ति पृथ्वी पर लौटेगा तो वह नव्वे साल का नहीं तीस साल का ही होगा।
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कोई भी व्यक्ति गुरुत्वाकर्षण के बाहर जाता है तो उसकी उम्र की प्रक्रिया रूक जाती है। स्विट्जरलैंड स्थित भावातीत ध्यान केंद्र की प्रयोगशाला में हुई खोजों ने साबित किया है कि गुरुत्वाकर्षण से बाहर होने पर ही नहीं ध्यान से भी वैसे ही परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
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प्रयोग किए गए और पता चला कि बंद आंखो के साथ जब पूरी तरह मौन धारण करने और ध्यान में जाने पर भी व्यक्ति गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो सकता है। प्रयोगों से सिद्ध हुआ कि ध्यान में स्वस्थ भाव से जाया जा सके तो पहला प्रभाव शरीर पर होता है।
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वह हल्का होने लगता है। हल्का होने का अर्थ वजन घटना नहीं है। वजन का अहसास घटना है। चित्त के सूक्ष्म में प्रवेश करने के बाद शरीर का बोध टूटने लगता है। ध्यान में गति जैसे जैसे जोर पकड़ती है, वैसे वैसे शरीर से तादात्म्य घटने लगता है। और तादात्म्य घटने के साथ ही शरीर गुरुत्वाकर्षण से छूटने लगता है।
ध्यान गहराने पर लगेगा कि यह मात्र लगता ही नहीं बल्कि शरीर मौन गुरुत्वाकर्षण के बाहर है। इस स्थिति में चाहें तो साधक अशरीरी यात्रा भी कर सकता है। पतंजलि ने योग सूत्रों में कहा है कि ध्यान सिद्ध होने पर जहां चाहें और जब चाहें आया जाया जा सकता है।