योग और प्राणायम में लोगों की बढ़ रही है रुचि, ये है असली वजह
- कटी हुई अंगुलियों के सहारे मानवीय देह की समग्रता को नहीं जाना जा सकता
- इक्कीसवीं सदी अध्यात्म की सदी के रूप में जानी जाएगी
- मनोरोगों का सही व संपूर्ण इलाज आध्यात्मिक तकनीकों के प्रयोग से
विस्तार
बेशक ऐलोपैथिक चिकित्सा के प्रयोगों और उपचारों के चमत्कारी नतीजे सामने आए हैं। लेकिन इस पद्धति से कितनी ही नई बीमारियां भी लग गई। हारकर विशेषज्ञों और लोगों का ध्यान वैकल्पिक चिकित्सा की ओर गया है। योग, प्राणायाम, ध्यान, प्राणिक हीलिंग, रेकी, पंचकर्म, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंचर, चुंबक चिकित्सा, रंग चिकित्सा आदि वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियां लोकप्रिय हो रही हैं। देश-विदेश के चिकित्सा विज्ञानी इन तकनीकों से मिलने वाली विश्रांति, घटने वाले तनाव, जीवनीशक्ति में अभिवृद्धि आदि परिणामों को देखकर हैरान हैं।
मनोचिकित्सा व अध्यात्म विद्या के बीच की दीवार टूट रही है
अमरीकी न्यूरोलॉजिस्ट मार्टिन रूथ चाइल्ड ने 'स्प्रिचुएलिटी एंड इट्स साइंटिफिक डाइमेन्शन्स" किताब में लिखा है कि अध्यात्मिक दृष्टि की वैज्ञानिकता पर फैशन के तौर पर प्रश्नचिह्न लगाना ठीक नहीं। विलियम वेस्ट की पुस्तक 'साइकोथेरेपी एण्ड स्प्रिचुएलिटी" उल्लेखनीय है। वेस्ट मानते हैं कि अब मनोचिकित्सा व अध्यात्म विद्या के बीच की दीवार टूट रही है। मनोरोगों का सही व संपूर्ण इलाज आध्यात्मिक तकनीकों के प्रयोग से ही संभव है।
कटी हुई अंगुलियों के सहारे मानवीय देह की समग्रता को नहीं जाना जा सकता
कार्लसन कहते हैं,''जिस तरह से कटी हुई अंगुलियों के सहारे मानवीय देह की समग्रता को नहीं जाना जा सकता, वैसे केवल देह के बलबूते संपूर्ण अस्तित्व को जानना असंभव है। उन्होंने कई सत्यों व तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कहा है कि जिस तरह बीसवीं सदी विज्ञान की सदी साबित हुई, उसी तरह इक्कीसवीं सदी अध्यात्म की सदी के रूप में जानी जाएगी।