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दान से नहीं भाव से मिलता है पुण्य

Tue, 07 May 2013 12:12 PM IST
ज्योतिर्मय
ज्योतिर्मय Updated Tue, 07 May 2013 12:12 PM IST
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feeling is more important in donation

दान का सीधा सा अर्थ है देना। लेकिन इसका

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जिक्र जब भी किसी सराहनीय और अवश्य किए जाने लायक काम के तौर पर किया जाता है तो  उसका अर्थ किसी की सेवा सहायता के लिए कुछ देना ही नहीं है बल्कि उसके साथ जुड़ी भावना भी काफी महत्पूर्ण हो जाती है।

स्वामी वेदभारती ने दान के विभिन्न रूपों और विधियों का अध्ययन निचोड़ पेश करते हुए कहा है कि दी गई वस्तु या रकम की मात्रा से ज्यादा उसे देते समय मन में आया भाव मायने रखता है। हो सकता है कि दी गई वस्तु की ज्यादा मात्रा से अधिक लोगों की सेवा सहायता हो जाए।

लेकिन देते समय मन में आया उदात्त और पवित्र भाव लेने वाले का तो भला करता ही है, देने वाले को भी आंतरिक रूप से निहाल करता है। प्रचलित तरीके के दान में जरूरतमंद लोगों को उनकी आवश्यकता की चीजें देकर दानधर्म का निर्वाह किया जाता है।

ज्यादा कमाई करने वाले लोगों या व्यावसायिक एजेंसियों या घरानों द्वारा लाभ का एक अंश लोकसेवी कामों में लगा कर दान की प्रक्रिया पूरी की जाती है। वेदभारती के अनुसार यह एक सामाजिक कर्म है और इससे कई लोगों की सेवा सहायता हो जाती है पर भावपूर्वक किए गए दान से देने और लेने वालों की, दोनों की आध्यात्मिक जरूरत पूरी होती है। इस तरह के दान का दर्जा स्थूल दान से बहुत ऊंचा है।

राम द्वारा लंका युद्ध से पहले सेतु बांधने के समय एक गिलहरी के अपने बालों में रेत भर कर लाने और उसके समुद्र में फेंकने के कर्म को बड़े महान सहयोगो के समान दर्जा देने के कृत्य को इसी अध्यात्म भाव से देखा गया है। स्वामीजी ने अपने अध्ययन के आधार पर यह भी निरूपित किया है  कि सेवा सहायता के कर्म को आध्यात्मिक रूप देने के लिए कुछ उपचार भी किए जाते हैं।

जैसे दान से पहले संकल्प करना, पूजा पाठ, याचक या दान लेने वाले का आदर सत्कार आदि का एक विधि विधान है। उस विधान का उद्देश्य मन को उस ऊंचाई तक ले जाना है, जहां से पवित्रता और उत्साह की लहर उठे।

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