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अरे वाह, सांसों को आते जाते हुए देखने के इतने फायदे!

Sun, 09 Feb 2014 12:35 PM IST
ज्योतिर्मय/अमर उजाला, दिल्ली।
ज्योतिर्मय/अमर उजाला, दिल्ली। Updated Sun, 09 Feb 2014 12:35 PM IST
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depression remedy through breathing

अगर खुशी के मौके पर भी आप खुश नहीं हो पाएं हों और गहरे शोक के अवसर पर भी दुःखी न हो पाए तो आपको सावधान होने की जरूरत है। ऐसा नहीं कि यह किसी उच्चकोटि के आत्मिक उत्कर्ष का लक्षण हैं। बल्कि चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार यह अवसाद यानी डिप्रैशन के लक्षण हैं।

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अगर यह उच्चकोटि की आत्मिक स्थिति जिसे- स्थित प्रज्ञ अवस्था कहते हैं होती तो मन में प्रसन्नता का भाव बना रहता और उत्साह में भी कोई कमी नहीं आती। अध्यात्म की भाषा में भी इस स्थिति को अवसाद कहते हैं। भारत में करीब पांच करोड़ लोग इस मनोरोग से पीड़ित माने जाते हैं।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक दुनिया भर में लगभग 35 करोड़ लोग अवसाद ग्रस्त रहते हैं। अवसाद की सबसे खराब स्थिति में पीड़ित आत्महत्या तक कर सकता है। जार्जिया के सेंटर फॉर स्पिरिचुअल रिसर्च के डा. एच अब्राह्म के अनुसार एक बार यह रोग पकड़ ले तो जिंदगी भर शामक दवाएं खानी पड़ सकती है।
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पर बीस मिनट का नियमित ध्यान इस रोग के लिए रक्षाकवच का काम करता है। बीस मिनट का अभ्यास पंद्रह से अठारह सप्ताह के भीतर ही शामक दवाओं की जरूरत खत्म कर देता है और उसके कुछ सप्ताह बाद तो रोग नियंत्रित होने लगता है।

डा. अब्राह्म ने अवसाद से पीडित चालीस लोगों पर ध्यान प्रयोग किया था। ये लोग पांच से दस मिलीग्राम तक ट्रेंकुलाइजर दवाएं लेते थे और मुश्किल से रोजमर्रा के काम कर पाते थे।

ध्यान प्रयोग के आठ सप्ताह बाद इन लोगों में भारी बदलाव देखा गया। ध्यान प्रयोग भी बहुत प्रारंभिक स्तर का था। सिर्फ सांसों को आते जाते देखना और उनमें एक लय बनाना था। रिसर्च सेंटर के निष्कर्षों के अनुसार अवसाद मे रोग का रूप नहीं लिया हो तो तनाव के समय सांसों को लयबद्ध बनाने का अभ्यास बहुत सहयोगी साबित होता है।


जो लोग तनाव के शिकार होने से पहले ही एकाग्रता पूर्वक सांसों को आते जाते देखने का अभ्यास करते हैं, उन्हे तनाव या असवाद से कभी जूझना ही नहीं पड़ता। इसलिए ध्यान साधना का थोड़ा ही सही, पांच मिनट तक भी नियमित अभ्यास किया जाए तो मन को थका देने और बेसुध कर देने वाले रोग से दूर रहा जा सकता है।

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