सिर्फ दवाइयों से ही ठीक नहीं होता रोगी, उपचार करने वालों में भी होनी ये चीज
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रोगी को रोगमुक्त करने के लिए कई तरह के उपचार आैर औषधि का सहारा लिया जाता है, पर रोगी इतने से ही सही नहीं होता। रोगमुक्त होने के लिए रोगी की इच्छा शक्ति और उपचार करने वाले व्यक्ति की प्राणशक्ति भी काम करती है। रोगी सही हो जाता है, तो लोग इसे भगवान की कृपा मानने लगते हैं, जबकि केवल कृपा ही रोगमुक्त नहीं करती। मनोरोग को दूर करने के लिए आज भी कोई सटीक उपचार नहीं खोजा गया है। मस्तिष्क को शरीर का एक हिस्सा भर मानकर उसे सुन्न करने, सुला देने, बिजली के झटके लगाने या शल्य चिकित्सा तक के इलाज की खोज हुई है, किंतु बात इतने से भी नहीं बनती। शरीर पंचतत्वों का बना है।
शरीर के लिए आहार और उपचार भी वैसा ही चाहिए, पर मन तो चेतन है। उसे ठीक करने में सचेतन व्यक्ति के मानसिक प्रयोग ही काम आते हैं और रोगी का ठीक होना या अधिक बीमार हो जाना चलता रहता है। सशक्त और स्वस्थ मानसिक क्षमता का प्रयोग किया जाए, तो उसका प्रभाव उपयुक्त होता है। जैसे दुर्जनों को सुधारने में सत्संग काम देता है। भलों के साथ रहकर बुरे भी सुधरते हैं। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि प्राणवानों के प्राण-प्रवाह का लाभ मानसिक रोगियों को ठीक करने में भी हो सकता है। आध्यात्म, चिकित्सा का आधार भी है। ब्रिटेन के सर नोबल पुरस्कार विजेता सर अलेक्सिस कैरेल ने प्रार्थना की शक्ति पर प्रकाश डाला है। उसके पीछे प्रयोक्ता या उपचार करने वाले का विश्वास काम करते हुए पाया है। कैरेल कहते हैं कि 'सच्चे मन से और विश्वास के साथ की गई प्रार्थना भी ऐसे तत्व उभार सकती है, जो प्रार्थना करने और प्रार्थना जिसके लिए की जा रही, उसे बल देकर सफल बनाए।” कनाडा के डॉ. सी. अलबर्ट कहते हैं कि यूं तो शल्य चिकित्सक औषधि देकर इलाज करते हैं, पर वह साथ-साथ प्रार्थना शक्ति पर भी विश्वास करते हैं।
चिकित्सा के साथ-साथ वह रोगमुक्ति की प्रार्थना भी करते और रोगी को भी प्रार्थना का परामर्श देते। उनका अनुभव था कि इस तरह रोग ठीक होने में सहायता मिली है। जिन रोगियों ने अविश्वास किया और उपेक्षा दिखाई, वह देर में अच्छे हुए।' डॉ. अलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक ‘मैन द अननोन’ में इंसानी मस्तिष्क की विलक्षण क्षमताओं पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, जिस तरह व्यायाम से शरीर को स्वस्थ और मजबूत किया जा सकता है। साधना-व्यायाम से मानसिक शक्ति का असाधारण विकास किया जा सकता है। चुम्बक शक्ति यदि रोग निवारण के लिए काम आ सकती है, तो मानवीय विद्युत चुम्बक का भी असर होना चाहिए। उसके जरिए पीड़ितों को राहत मिलनी चाहिए, वह चुम्बकत्व मनुष्य में भी है। एक सशक्त चुम्बकत्व वाला या चुंबकीय शक्ति वाला प्राणवान व्यक्ति, दुर्बल व्यक्ति की ऐसी ही सहायता कर सकता है जैसे कोई वयस्क व्यक्ति बच्चे की गोद में उठाये फिरता है। अमेरिका में एक चमत्कारी चिकित्सक ऑस्कर इस्टेवनी रोगी के बीमार अंगों पर हाथ फेरकर कष्ट मुक्त करते थे। वह अपने शरीर की प्राण विद्युत बढ़ाकर रोगी के शरीर में प्रवेश कराते थे।
अच्छे होने वालों की संख्या दिन ओ दिन बढ़ती गई, तो बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक भी आने लगे। मनोवैज्ञानिकों ने इसे इच्छा शक्ति का प्रयोग और रोगी की भाव श्रद्धा का सहयोग बताया, लेकिन मानना यही पड़ा कि जिन पर प्रयोग होता है, उन्हें लाभ मिलता है। रूस की कजाकिस्तान स्टेट विश्वविद्यालय की जैव प्रयोगशाला के निर्देशक डॉ. ईन्यूशिन ने अपने शोध पत्र में बायो प्लाज्मा के संबंध में अधिक प्रकाश डाला है। उनने कीर्लियन फोटोग्राफी के आधार पर ऐसे चित्र भी लिए, जो जीवित प्राणियों के इर्द-गिर्द एक विशेष आभा मंडल होने के प्रमाण देते हैं। यह प्रकाश, मुख मंडल पर, उंगलियों के छोरों पर विशेष मात्रा में देखा गया। डॉ. ईन्युशिन के अनुसार, यह बायोप्लाज्मा मात्र प्रकाश नहीं है। उनमें विद्युतीय चुम्बकीय विशेषताएं भी हैं। जर्मनी के विज्ञान वेत्ता प्रो. विलहेम रॉख ने शरीर में विशेष प्रकार की विद्युत का अस्तित्व पाया है। उसे उन्होंने आर्गोन नाम दिया है। उनका कहना है कि यह बिजली समर्थ क्षेत्र से असमर्थों की ओर दौड़ने और उनकी सहायता करने में पूरी तरह समर्थ है। प्रार्थना की शक्ति को वह प्रयोक्ता की सद्भावना, सच्चाई एवं व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का मेल मानते हैं। इन तीनों का संयोग जो नतीजे देता है उसी को दूसरे शब्दों में ईश्वरीय अनुकंपा का नाम दिया जाता है। किसी अदृश्य सत्ता के अनायास ही प्रसन्न होकर कुछ बरसा देने की कामना करने वाले तो आत्म प्रवचक ही कहे जाते हैं।