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सितंबर और अक्तूबर में सबसे अधिक बच्चे पैदा क्यों होते हैं

Wed, 28 Jan 2015 04:06 PM IST
Updated Wed, 28 Jan 2015 04:06 PM IST
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basant effect on child birth

होना तो यह चाहिए कि साल के सभी महीनों या दिनों में बच्चों के जन्म की दर करीब करीब बराबर या थोड़ी बहुत कम ज्यादा हो। लेकिन सीलिसबर्ग (स्विटजरलैंड) के महर्षि वेदविद्या प्रतिष्ठान के विद्यार्थियों और विद्नानों ने अट्ठारह अस्पतालों में तीन हजार बच्चों के जन्म का अध्ययन कर पाया है कि सोलह से बीस प्रतिशत तक बच्चे सितंबर या अक्टूबर में जन्म लेते हैं।

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इस अध्ययन का सार यह है कि पैतींस से सैंतीस सप्ताह पहले उनके गर्भाधान का समय स्थिर करें तो वह वसंत के आसपास बैठता है। दुनिया के सभी देशों में जनवरी से फरवरी का महीना वसंत ऋतु का माना जाता है।
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ऋतुएं सूरज के बजाय चंद्रमा के हिसाब से ज्यादा संचालित होती है। इसलिए यह समय पंचाग के अनुसार माघ महीने के बीच का, यानी वसंत पंचमी के आसपास होना चाहिए।

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बच्चे सितंबर के अंत और अक्तूबर के पहले सप्ताह में ही क्यों जन्म लेते हैं

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प्रसूति गृहों में बच्चों की जन्मदर का विश्लेषण सैंकड़ों साल पहले लिखे गए गर्भ उपनिषद से मेल खाता है। उपनिषदों की संख्या दो सौ से ज्यादा है। उनमें बारह प्रमुख हैं।

गर्भ उपनिषद उनकी तुलना में गौण है। मनीषियों ने इस पुस्तक में अपने ढंग से जो लिखा वह एनोटामी की गणनाओं से बहुत मेल खाता हैं। गर्भ उपनिषद में नौ महीने तक बच्चे के विकास की क्रमवार जानकारी दी है। वेद विज्ञान प्रतिष्ठान के अन्वेषकों का कहना है कि यह जानकारी शरीर रचना और विकास शास्त्र की आधुनिक सूचनाओं की पुष्टि करती हैं।

यह भी कह सकते है कि शरीर रचना विज्ञान और उपनिषद एक ही नतीजे पर पहुंचते हैं। अध्ययन का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बीस प्रतिशत बच्चे सितंबर के उत्तरार्ध और अक्तूबर के पहले सप्ताह अर्थात तीन सप्ताहों में ही क्यों जन्म लेते हैं।

बच्चे वसंत के दिनों में ही गर्भ में आते हैं

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प्रतिष्ठान की अध्ययन टीम के प्रमुख जार्ज गैरिसन का कहना है कि बहुत संभव है कि ये बच्चे वसंत के दिनों में ही गर्भ में आए रहे हों। अर्थात वसतं के दिनों में प्रकृति ऐसी व्यवस्था या प्रेरणा संचारित करती है कि माघ के तीसरे चौथे सप्ताह में ही नई आत्माएं शरीर में प्रवेश करती हैं।

जार्ज का मानना है कि मनुष्यों में ही नहीं पशु पक्षियों और पेड़ पौधों में भी नया विस्तार इन्हीं दिनों अंकुरित होता या उस लायक स्थितियां महसूस करता है। वे तो इन दिनों साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में भी नई उमंगों का संचार होने की बात कहते हैं।

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